गंगा की चिंता: बोले प्रो विश्वम्भरनाथ मिश्र - गंगा मात्र नदी नहीं वह मीडियम ऑफ लाइफ है, गंगा में अवैज्ञानिक प्रयोग बंद हो नहीं तो गहरायेगा संकट...

गंगा को नदी समझना हमारी सबसे बड़ी भूल। गंगा हमारे लिए मीडियम ऑफ लाइफ है। वह भुक्ति और मुक्ति की दात्री है। गंगा राष्ट्रीय एकता की प्रतीक है।चिंता जताते हुए प्रोफेसर मिश्र ने कहा सबसे बड़ा संकट भविष्य में यह दिखाई दे रहा है कि कही गंगा काशी के घाटों को छोड़ न दे।

गंगा की चिंता: बोले प्रो विश्वम्भरनाथ मिश्र - गंगा मात्र नदी नहीं वह मीडियम ऑफ लाइफ है, गंगा में अवैज्ञानिक प्रयोग बंद हो नहीं तो गहरायेगा संकट...

वाराणसी, भदैनी मिरर। धर्म, अध्यात्म और संस्कृति को समेटे 2525 किलोमीटर लंबी गंगा का महत्त्व काशी में बढ़ जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने इस महत्व को जानकार ही गंगा कार्ययोजना का आग़ाज़ 1986 में बनारस से ही किया था, लेकिन बाद की सरकारों ने योजनाओं का नाम बदलने और विचित्र अवैज्ञानिक रास्तों पर चलने में दिलचस्पी ली। बनारस में गंगा की दो सहायक नदियाँ 'असि और वरुणा' गंगा की धारा को नियमित करने और घाटों से गंगा की सिल्ट को हटाने का काम प्राकृतिक ढंग से करती रही हैं, जो विलुप्त होने के कगार पर है उक्त बातें संकटमोचन फाउंडेशन के अध्यक्ष व महंत प्रोफेसर विश्वम्भरनाथ मिश्र ने वाराणसी स्थित पराड़कर स्मृति भवन सभागार में काशी विचार मंच के तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी में बतौर विशिष्ट वक्ता कही।


प्रो. विश्वम्भरनाथ मिश्र ने कहा कि गंगा को नदी मानना ही हम सबकी भूल है। गंगा हमारे लिए मीडियम ऑफ लाइफ है, गंगा हमारे कर्म में यानि पूजा-पाठ के अलावा उनसे हमारा सस्वत सम्बंध है अर्थात वह जीवित है। इसके साथ ही वह भुक्ति और मुक्ति की दात्री है। गंगा प्रेमी व महंत संकटमोचन प्रो. विश्वम्भरनाथ मिश्र ने कहा कि गंगा आज भी दूषित नहीं है, गंगा को साफ करना हम सबके बस की बात भी नही है। उनके स्वरुप को केवल गिरते गन्दे नालों ने खराब किया है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि मेरी बस एक मांग है कि गंगा में गिरते नालों को कागजी रुप से नहीं बल्कि हकीकत में रोक दिया जाए तो गंगा अपने वास्तविक रुप में आ जाएंगी।


गंगा जी के साथ अवैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित जो प्रयोग हो रहे है उसे तत्काल बन्द कर देना चाहिए। गंगा जी आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक रुप से हमें मजबूत बनाती है। गंगा जी से जलीय जीव के साथ करीब 40 करोड़ जनता सीधे जुुुुड़ी है। सबसे महत्वपूर्व यह है कि गंगा राष्ट्रीय एकता की प्रतीक है। गंगा से हिन्दू अपने धर्म के कार्य करता है तो मुस्लिम वजू करता है, गंगा से पूरा देश जुड़ा है। इन्हें नदी मानने की भूल नहीं जानी चाहिए। चिंता जताते हुए प्रो. विश्वम्भरनाथ मिश्र ने कहा कि गंगा के समानांतर जो नहर बनाने का जो कार्य हो रहा है उससे सबसे बड़ा संकट भविष्य में यह दिखाई दे रहा है कि कही गंगा काशी के घाटों को छोड़ न दे। दूसरा यह की गंगा की धारा को रोकना भी भविष्य के लिए घातक होगा।