विश्व प्रसिद्ध रामनगर रामलीला: भावुक प्रसंग; जटायु अंत्येष्टि, शबरी मिलन और सुग्रीव-हनुमान मिलन की मनमोहक कथा
'हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी...' प्रभु श्रीराम के विरह और जटायु के उद्धार से भावविभोर हुए दर्शक; ऋष्यमूक पर्वत पर हुआ हनुमान जी से मिलन।
वाराणसी (भदैनी मिरर डेस्क): विश्व प्रसिद्ध काशी की रामनगर रामलीला अपनी अलौकिक परंपरा और सजीव मंचन के लिए पूरे देश में विख्यात है। रामलीला के 17वें दिन का मंचन अत्यंत मार्मिक और भक्तिरस से ओत-प्रोत रहा। आज की कथा में भगवान श्रीराम के माता सीता की खोज में विरह वेदना, जटायु का उद्धार, शबरी मिलन और अंततः सुग्रीव-हनुमान मिलन के प्रसंगों ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।

भगवान राम ने किया जटायु का अंतिम संस्कार
लीला की शुरुआत में प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण वन-वैन भटकते हुए माता जानकी की खोज में पशु-पक्षियों, पेड़ों, पर्वतों और नदियों से पूछते नजर आए— “हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।।”
तभी मार्ग में उन्हें घायल अवस्था में गिद्धराज जटायु मिलते हैं, जो माता सीता के रावण द्वारा हरण का पूरा वृत्तांत प्रभु को सुनाते हैं। राम जी जटायु को गले लगाते हैं और उनके प्राण त्यागने के बाद अपने हाथों से उनका अंतिम संस्कार (अंत्येष्टि) करते हैं। जटायु दिव्य रूप धारण कर श्रीराम की वंदना करते हैं। इसके बाद कबंध का उद्धार करते हुए प्रभु शबरी के आश्रम पहुंचते हैं।
शबरी का आतिथ्य और नवधा भक्ति का ज्ञान
शबरी जी अपने आराध्य को सामने पाकर प्रेम से विभोर हो जाती हैं। वह प्रभु को अपने हाथों से चुनकर प्रेमपूर्वक झूठे बेर खिलाती हैं, जिसे भगवान श्रीराम अत्यंत प्रसन्नता के साथ ग्रहण करते हैं। इसके बाद प्रभु शबरी को 'नवधा भक्ति' का उपदेश और ज्ञान प्रदान करते हैं।
आगे की यात्रा में पंपासर पहुंचने पर नारद जी भगवान से मिलते हैं। नारद जी द्वारा अपने पूर्व के श्राप और माया-मोह के प्रसंग की चर्चा पर भगवान उन्हें समझाते हैं कि वे सच्चे भक्तों की रक्षा मां की भांति करते हैं। इसके बाद दोनों के बीच भक्ति, संत और असंत के भेदों पर गहरी ज्ञान-चर्चा होती है।
सुग्रीव-हनुमान मिलन और बालि वध का संकल्प
कथा आगे बढ़ते हुए ऋष्यमूक पर्वत की ओर पहुंचती है, जहाँ सुग्रीव प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को बालि का भेजा हुआ दूत समझकर भ्रमित होते हैं और हनुमान जी को उनका भेद लेने के लिए भेजते हैं।
संकटमोचन हनुमान जी साधु का वेश धरकर आते हैं और प्रभु के चरण कमलों को पहचानकर दोनों भाइयों को अपने कंधे पर बैठाकर आकाश मार्ग से सुग्रीव के पास ले जाते हैं। सुग्रीव प्रभु को देखकर अपने और बालि के बीच के मतभेद और दुखों की कथा सुनाते हैं।
भगवान राम सुग्रीव को अभयदान देते हुए मित्र धर्म का पालन करने का वचन देते हैं और बालि वध का निर्णय लेते हैं। जब सुग्रीव प्रभु की शक्ति की परीक्षा लेने के लिए एक ही बाण से सातों ताड़ के पेड़ों को भेदने की बात कहते हैं, तो प्रभु अपनी मुस्कान के साथ एक ही बाण से सातों ताल के वृक्षों को धराशायी कर देते हैं।
लीला के अंत में सभी वानर समूह प्रभु के पीछे-पीछे चलते हैं और सुग्रीव द्वारा आरती उतारी जाती है। इस अलौकिक दृश्य को देखकर उपस्थित सभी लीलाप्रेमी 'जय सिया राम' के जयकारों से पूरा क्षेत्र गुंजायमान कर देते हैं।

