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Varanasi News: काशी में अब डिजिटल तर्पण, विदेशों में बैठे NRI वीडियो कॉल से कराएंगे पितरों का श्राद्ध

वीजा की अड़चन और व्यस्तता के बीच स्मार्टफोन और ट्राइपॉड से हो रहा ई-तर्पण; 5,100 से 51,000 रुपये तक के पैकेज, भदैनी मिरर की विशेष रिपोर्ट।

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वाराणसी / डिजिटल डेस्क (भदैनी मिरर): बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में पितृपक्ष के पावन अवसर पर सनातन परंपरा और आधुनिक तकनीक का एक अनोखा संगम देखने को मिल रहा है। समय की कमी, व्यस्तता और वीजा की अड़चनों के चलते जो अप्रवासी भारतीय (NRI) पितरों के तर्पण के लिए काशी नहीं पहुंच पा रहे हैं, उनके लिए अब 'डिजिटल तर्पण' और 'ई-पिंडदान' का विकल्प सहारा बन गया है।

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काशी के घाटों पर अब कर्मकांडी ब्राह्मण हाथों में कुश, तिल और गंगाजल के साथ-साथ ट्राइपॉड और स्मार्टफोन थामे नजर आ रहे हैं, जिसके जरिए सात समंदर पार बैठे श्रद्धालुओं को ऑनलाइन संकल्प दिलाकर श्राद्ध कर्म संपन्न कराया जा रहा है।

₹5,100 से ₹51,000 तक के विशेष ई-तर्पण पैकेज

डिजिटल तर्पण की बढ़ती मांग को देखते हुए वाराणसी के तीर्थ पुरोहितों और कर्मकांडी ब्राह्मणों ने श्रद्धालुओं की सुविधा अनुसार विशेष पैकेज तैयार किए हैं:

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  • तर्पण और पिंडदान पैकेज: ई-तर्पण और ई-पिंडदान के लिए ₹5,100 से लेकर ₹51,000 तक के पैकेज उपलब्ध कराए गए हैं।

  • वैश्विक मांग: अमेरिका, जापान, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, सिडनी और स्पेन जैसे देशों में रहने वाले भारतीय नागरिक पहले से ही काशी के आचार्यों से संपर्क साधकर अपनी बुकिंग सुनिश्चित करा रहे हैं।

  • गूगल मीट और वीडियो कॉल से संकल्प: विभिन्न ऑनलाइन ऐप्स और गूगल मीट (Google Meet) के माध्यम से एनआरआई यजमानों को लाइव जोड़कर मंत्रोच्चार के साथ शुद्ध संकल्प दिलाया जा रहा है।

ऐप्स और स्टार्टअप्स के जरिए भी हो रही बुकिंग, 20% ग्राहक NRI

ई-तर्पण के इस दौर में अब कई टेक कंपनियां और स्टार्टअप्स भी मैदान में उतर चुके हैं। नोएडा, गुड़गांव, बेंगलुरु और हरियाणा की कई कंपनियां सोशल मीडिया व मोबाइल ऐप्स के जरिए ई-पिंडदान की सेवाएं दे रही हैं।

गूगल मीट और जूम जैसे प्लेटफॉर्म के माध्यम से यजमानों को काशी, गया और हरिद्वार के पवित्र तटों से सीधे जोड़ा जा रहा है। एक ऐप के प्रतिनिधि के अनुसार, केवल त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए ही अब तक 100 से अधिक बुकिंग हो चुकी हैं, जिनमें से करीब 20 प्रतिशत ग्राहक विदेशों में बसे अप्रवासी भारतीय हैं।

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धर्मशास्त्रियों का मत: "सच्चे मन से किया गया संकल्प ही सर्वोपरि"

प्राचीन काल और आधुनिक दौर में आए इस बदलाव पर काशी के विद्वानों का कहना है कि शास्त्रों में 'भाव' और 'संकल्प' का सबसे बड़ा महत्व बताया गया है।

काशी के वरिष्ठ आचार्यों के अनुसार:

"प्राचीन समय में तकनीक उपलब्ध नहीं थी, लेकिन समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है। यदि कोई यजमान किसी मजबूरीवश भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हो सकता, लेकिन वह पूरी पवित्रता और सच्चे मन से ऑनलाइन संकल्प लेकर तर्पण कराता है, तो उसका फल भी उतना ही प्राप्त होता है। पितरों का स्मरण न करने से बेहतर है कि किसी भी माध्यम से उनका पूर्ण श्रद्धा भाव से पूजन किया जाए।"