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ताकतवर माध्यम है सोशल मीडिया, पत्रकारिता एक दर्पण और दर्पण ही पत्रकारिता-राज्यमंत्री

चुनौतियों के बीच सोशल मीडिया का सदुपयोग करते हुए पत्रकारिता को आगे बढ़ाना समय की आवश्यकता-संजीव भानावत

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डिजिटल दौर में जनमत की नई ताकत बन रहा सोशल मीडिया- डॉ. संतोष शाह 

सोशल मीडिया के दौर में पत्रकारिता पर मंथन, काशी हिंदू विश्वविद्यालय में तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन

वाराणसी, भदैनी मिरर। सोशल मीडिया अपनी बात कहने का एक सशक्त माध्यम है, जो घर-घर तक प्रभावी है। इसके जरिए कोई भी घटना तेजी से हर व्यक्ति तक पहुंचती है। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि सोशल मीडिया के नकारात्मक पहलू भी हैं और यदि कोई व्यक्ति इसका दुरुपयोग करता है या नकारात्मकता फैलाता है, तो उस पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है। यह बातें शुक्रवार को बीएचयू पत्रकारिता विभाग में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में बतौर मुख्य अतिथि उप्र के स्वतंत्र प्रभार मंत्री रवीन्द्र जायसवाल ने कही। उन्होंने कहाकि समाज और देशहित को प्राथमिकता देते हुए मीडिया की सामाजिक जिम्मेदारी है। हाल की नेपाल दुर्घटनाओं का उल्लेख करते हुए संवेदनशील रिपोर्टिंग की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। कहाकि मेरा मानना है कि पत्रकारिता एक दर्पण है और दर्पण ही पत्रकारिता है। 
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताते हुए मंत्री ने कहा कि भारत में मीडिया के लिए कई कानून बनाए हैं, क्योंकि यह समाज को दिशा देने का कार्य करता है। उन्होंने कहा कि समय के साथ मीडिया के स्वरूप में निरंतर परिवर्तन होता रहा है। पहले रेडियो, फिर अखबार और टेलीविजन का दौर आया। 

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काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा “सोशल मीडिया के दौर में पत्रकारिता और जनसंचार के बदलते रुझान” विषय पर आयोजित तीन दिवसीय संगोष्ठी का शुभारंभ गरिमामय वातावरण में हुआ। उद्घाटन सत्र की शुरुआत महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा पर पुष्प अर्पण, दीप प्रज्वलन एवं कुलगीत गायन के साथ की गई। यह संगोष्ठी 18 जनवरी तक चलेगी, जिसमें देशभर से शिक्षाविद्, शोधार्थी और मीडिया विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं। उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि मंत्री  रविंद्र जायसवाल रहे। अतिथियों का स्वागत संगोष्ठी के आयोजक प्रो. डॉ. बाला लखेंद्र, कला संकाय की प्रमुख श्रीमती सुषमा घिल्डियाल और पत्रकारिता एवं जनसंपर्क विभाग के अध्यक्ष प्रो. ज्ञान प्रकाश मिश्रा द्वारा पुष्पगुच्छ एवं अंगवस्त्र भेंट कर किया गया। विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित नेहरू ग्राम भारती विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. राम मोहन पाठक ने शीत युद्ध के दौर की प्रोपेगेंडा न्यूज़ का उल्लेख करते हुए कहा कि आज सोशल मीडिया पारंपरिक पत्रकारिता के मूल्यों को तोड़ रहा है और सूचना प्रदूषण को बढ़ावा दे रहा है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि तथ्य और सत्य के स्थान पर अफवाहें और भ्रामक सूचनाएँ तेज़ी से प्रसारित हो रही हैं, जो समाज के लिए गंभीर चुनौती है।

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काशी विद्यापीठ के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल उपाध्याय ने कहा कि भारत में पत्रकारिता की भूमिका ऐतिहासिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। समय के साथ पत्रकारिता का स्वरूप बदला है और अब सोशल मीडिया के माध्यम से राजनीतिक गतिविधियां भी संचालित हो रही हैं। उन्होंने आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की भाषा, प्रिंट मीडिया के भविष्य और तकनीक के साथ भाषा के संतुलन पर ज़ोर देते हुए कहा कि सही तालमेल से पत्रकारिता अधिक प्रभावी बन सकती है, हालांकि आज प्रिंट मीडिया और हिंदी पत्रकारिता को सोशल मीडिया से कड़ी चुनौती मिल रही है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की कला संकाय की प्रमुख प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने कहा कि यह देखकर हर्ष होता है कि पत्रकारिता एवं जनसंपर्क विभाग ने विभिन्न विश्वविद्यालयों के विद्वानों को आमंत्रित कर एक सार्थक पहल की है। उन्होंने कहा कि खबरों को जिम्मेदारी के साथ समाज तक पहुँचाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है और केवल सच्ची व सही खबरों का ही प्रकाशन किया जाना चाहिए। इस दिशा में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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पीआएसआई वाराणसी चौप्टर अध्यक्ष अनिल जादोदिया ने कहा कि आज से पचास वर्ष पहले भी यदि कोई सेमिनार हुआ होगा, तो उसका विषय भी संभवतः “मास मीडिया में बदलते रुझान” ही रहा होगा। उन्होंने बताया कि पहले भारत जैसे विशाल देश में क्षेत्रीय खबरें इसलिए छूट जाती थीं क्योंकि संवाददाताओं की कमी होती थी। उन्होंने पत्रकारिता में निष्पक्षता पर ज़ोर देते हुए कहा कि पत्रकारिता तभी सार्थक है जब वह नीतिपरक और ईमानदार हो। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे कम्युनिकेशन टुडे के चीफ एडिटर संजीव भनावत ने कहा कि एक सच्चे पत्रकार को पत्रकारिता को अपने बच्चों की तरह स्नेह और जिम्मेदारी से देखना चाहिए। उन्होंने 1970 के दशक से अब तक आए तकनीकी परिवर्तनों का उल्लेख करते हुए कहा कि हर नई तकनीक चाहे वह टीवी, सिनेमा, एफएम रेडियो या कंप्यूटर हो, शुरुआत में भाषा और युवाओं के लिए खतरा मानी गई, लेकिन आज ये सभी माध्यम मोबाइल में समाहित हो चुके हैं। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस पर चर्चा करते हुए कहा कि जहां एआई की सीमा समाप्त होती है, वहीं से मनुष्य की सोच शुरू होती है। चैट जीपीटी और जेमिनी जैसे टूल्स के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव हैं, संपादकीय शक्ति कमजोर हुई है और वरिष्ठता पर भी प्रश्न खड़े हो रहे हैं। इन चुनौतियों के बीच सोशल मीडिया का सदुपयोग करते हुए पत्रकारिता को आगे बढ़ाना ही समय की आवश्यकता है।

अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में काठमांडू, नेपाल से आये अतिथि वक्ता टुडे यूथ एशिया के अध्यक्ष डॉ. संतोष शाह ने वर्तमान पत्रकारिता पर सोशल मीडिया के प्रभाव को रेखांकित करते हुए कहा कि आज सामाजिक और राजनीतिक घटनाओं के निर्माण तथा प्रसार में सोशल मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। उन्होंने नेपाल और बांग्लादेश में हाल के दिनों में घटी प्रमुख घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन घटनाओं के घटित होने और उनके व्यापक स्तर पर प्रसार में सोशल मीडिया ने निर्णायक भूमिका निभाई। सोशल मीडिया अब केवल सूचना का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि यह जनमत निर्माण और सामाजिक आंदोलनों को प्रभावित करने वाली एक शक्तिशाली ताकत बन चुका है, जिससे पत्रकारिता के स्वरूप और उसकी जिम्मेदारियों में भी निरंतर परिवर्तन हो रहा है। संचालन अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजन सचिव डॉ. बाला लखेंद्र ने किया और धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत पत्रकारिता एवं जनसंपर्क विभाग के अध्यक्ष प्रो. ज्ञान प्रकाश मिश्रा ने किया। उन्होंने कहाकि कहा कि यदि प्रिंट मीडिया परंपरा का प्रतीक है, तो सोशल मीडिया आधुनिकता का प्रतिनिधित्व करता है। प्रिंट मीडिया जहां स्थिर और विश्वसनीय माध्यम है, वहीं सोशल मीडिया गतिमान, त्वरित और व्यापक पहुंच वाला माध्यम बन चुका है। प्रो. मिश्रा ने सोशल मीडिया के सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों पहलुओं पर चर्चा करते हुए कहा कि इसके विवेकपूर्ण उपयोग से पत्रकारिता को नई दिशा मिल सकती है।  तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के प्रथम दिन विभिन्न सत्रों में देश विदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के शिक्षाविदों, शोधार्थियों और छात्र-छात्राओं ने 40 शोध पत्र प्रस्तुत किए। आगामी दिवसों में कुल 200 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किये जाएंगे।

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