दमन या लोकतंत्र? नोएडा मजदूर आंदोलन से जुड़े एक्टिविस्टों पर NSA लगाने के खिलाफ बुद्धिजीवियों ने खोला मोर्चा
पत्रकार सत्यम वर्मा और छात्रा आकृति चौधरी को बताया गया 'मुख्य साजिशकर्ता'
नोएडा/लखनऊ। उत्तर प्रदेश के नोएडा में चल रहे मजदूर आंदोलन को लेकर पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा और छात्र एक्टिविस्ट आकृति चौधरी पर उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका/NSA), 1980 लगाए जाने के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों में भारी आक्रोश है।


इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा हमला बताते हुए सामाजिक संगठनों ने सभी गिरफ्तार कार्यकर्ताओं की तत्काल रिहाई की मांग की है।
एक महीने बाद लगा रासुका: पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल
गौरतलब है कि सत्यम वर्मा और आकृति चौधरी पिछले एक महीने से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में हैं। आरोप है कि पुलिस उनके खिलाफ हिंसा में लिप्त होने के कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाई है। अब रासुका लगाए जाने को उनकी रिहाई रोकने की एक "साजिश" के रूप में देखा जा रहा है।

कौन हैं सत्यम वर्मा और आकृति चौधरी?
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सत्यम वर्मा: तीन दशकों तक 'यूनीवार्ता' में रहे वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं। उन्होंने शहीद भगत सिंह के लेखन का संकलन भी किया है। उनके समर्थकों का दावा है कि वे पिछले 12 सालों से नोएडा ही नहीं गए, फिर भी उन्हें मुख्य साजिशकर्ता बनाया गया है।
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आकृति चौधरी: दिल्ली विश्वविद्यालय की मेधावी छात्रा और रंगकर्मी हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने मजदूरों के बीच शांतिपूर्ण हड़ताल की वकालत की थी।
इन कार्यकर्ताओं की रिहाई की भी उठी मांग
आंदोलन से जुड़े अन्य कार्यकर्ताओं को लेकर भी सरकार को घेरा जा रहा है, जिनमें प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं:
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आदित्य आनंद: NIT जमशेदपुर से इंजीनियर, जिन्हें पुलिस मास्टरमाइंड बता रही है।
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रूपेश रॉय: नौजवान भारत सभा से जुड़े ऑटो चालक।
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सृष्टि गुप्ता: शांतिनिकेतन की पूर्व छात्रा और कलाकार।
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मनीषा चौहान: फैक्ट्री वर्कर और सामाजिक कार्यकर्ता।
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हिमांशु ठाकुर: दिशा छात्र संगठन से जुड़े युवा।
"यह अघोषित आपातकाल घोषित आपातकाल से कहीं अधिक खतरनाक है। जब पुलिस सबूत पेश नहीं कर पा रही, तो रासुका जैसे दमनकारी कानूनों का सहारा लेकर आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है।" — कार्यकर्ताओं का साझा बयान
मजदूर आंदोलन और दमन का आरोप
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि नोएडा, गुड़गांव और मानेसर के मजदूरों की जायज मांगों को सुनने के बजाय सरकार लाठी और जेल के दम पर आंदोलन कुचलना चाहती है। कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि दमन से प्रतिरोध नहीं रुकेगा। जेल के भीतर भी साथियों के हौसले बुलंद हैं और वे लगातार अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं।

