लमही में 'प्रेमचंद जयंती समारोह-2026' का आगाज़: "प्रेमचंदः मेरे लिए" परिसंवाद में जुटे देशभर के विद्वान
बीएचयू प्रेमचंद शोध संस्थान में तीन दिवसीय समारोह शुरू; कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी बोले—'प्रेमचंद जयंती' को हर साल 'प्रेमचंद उत्सव' के रूप में मनाए विश्वविद्यालय।
भदैनी मिरर, वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कला संकाय के अंतर्गत लमही स्थित मुंशी प्रेमचंद स्मारक एवं शोध संस्थान में तीन दिवसीय 'प्रेमचंद जयंती समारोह-2026' का शुक्रवार को गरिमामय शुभारंभ हुआ। समारोह के प्रथम दिन आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद में देश भर से आए मूर्धन्य विद्वानों, कथाकारों और समीक्षकों ने मुंशी प्रेमचंद के साहित्यिक अवदान, सामाजिक दृष्टि और उनकी कालजयी विरासत पर विस्तृत मंथन किया।


"प्रेमचंद केवल अतीत के नहीं, भविष्य के भी मार्गदर्शक हैं" — प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी
प्रथम सत्र की अध्यक्षता करते हुए बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि आज हम जिस आधुनिक और जागरूक समाज में सांस ले रहे हैं, वहां तक पहुंचने में प्रेमचंद की धारदार लेखनी का अतुलनीय योगदान है। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों का विरोध कर साहित्य को समाज परिवर्तन का हथियार बनाया।

कुलपति का महत्वपूर्ण सुझाव: प्रो. चतुर्वेदी ने आह्वान किया कि प्रेमचंद जयंती के आयोजनों को सिर्फ एक औपचारिक समारोह तक सीमित न रखकर हर वर्ष व्यापक "प्रेमचंद उत्सव" के रूप में आयोजित किया जाना चाहिए। साथ ही नई पीढ़ी और युवाओं को जोड़ने के लिए विद्यालयी व विश्वविद्यालयी स्तर पर प्रेमचंद के जीवन-साहित्य पर आधारित प्रश्नोत्तरी (Quiz) प्रतियोगिताएं कराई जाएं।
प्रेमचंद: आधुनिक राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक न्याय के अग्रदूत
परिसंवाद के दौरान वरिष्ठ साहित्यकारों ने प्रेमचंद के विविध आयामों को रेखांकित किया:
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प्रो. आशुतोष कुमार (दिल्ली वि०वि०): "20वीं सदी में आधुनिक भारतीय राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर, अल्लामा इकबाल और प्रेमचंद की मुख्य भूमिका रही। 1917 के चंपारण सत्याग्रह और रूसी क्रांति का प्रभाव 'प्रेमाश्रम' व 'रंगभूमि' में साफ झलकता है।"
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प्रख्यात कथाकार अखिलेश: "गांधी जी यदि नागरिक के तौर पर प्रेरणा हैं, तो एक लेखक के रूप में प्रेमचंद हमारे सबसे बड़े पूर्वज और पथप्रदर्शक हैं। उन्होंने 'कफन', 'गोदान' और 'ठाकुर का कुआँ' से वंचितों को आवाज दी।"
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प्रो. अरुण कमल: "जिस तरह काशी अध्यात्म का तीर्थ है, उसी तरह लमही साहित्य का पवित्र तीर्थ है। प्रेमचंद ने साहित्य को 'देशभक्ति और राजनीति के आगे चलने वाली मशाल' माना था।"
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प्रो. सुषमा घिल्डियाल (संकाय प्रमुख, कला संकाय): "प्रेमचंद किसी एक वर्ग या विचारधारा के नहीं, बल्कि जन-जन के हैं। संस्थान का उद्देश्य उनके विचारों को वैश्विक मंचों तक पहुंचाना है।"
सत्र का समन्वय प्रो. नीरज खरे, संचालन डॉ. विवेक सिंह और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शिल्पा द्वारा किया गया।
द्वितीय सत्र: प्रेमचंद की पत्रकारिता और सामाजिक सरोकार
समारोह के दूसरे बौद्धिक सत्र का विषय 'प्रेमचंद की पत्रकारिता' रहा, जिसकी अध्यक्षता प्रो. आशीष त्रिपाठी ने की।

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प्रो. अनुराग दवे (पत्रकारिता विभाग): "प्रेमचंद हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के बीच एक मजबूत पुल थे। उन्होंने 'हंस' और 'जागरण' के माध्यम से स्त्री अधिकार, किसान आंदोलन और सामंतवाद के खिलाफ अलख जगाई।"
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डॉ. अविनाश कुमार सिंह: "आज के सोशल मीडिया और डिजिटल दौर में जब विश्वसनीयता की चुनौती है, तब प्रेमचंद की जनपक्षधर और मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता और अधिक प्रासंगिक हो जाती है।"
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प्रो. प्रभाकर सिंह: "प्रेमचंद के लिए स्वाधीनता का अर्थ केवल अंग्रेजी हुकूमत से आजादी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक बंधनों से मुक्ति था।"
द्वितीय सत्र का संचालन डॉ. किरण तिवारी और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. धीरेंद्र कुमार राय ने प्रस्तुत किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी और लमही गांव के स्थानीय नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।


