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रंगभरी एकादशी को गौरा को विदा कराकर ले जाएंगे श्रीकाशी विश्वनाथ, मंदिर में जाने के लिए मिली महज 64 लोगों को अनुमति

सैकड़ों साल से चली आ रही परम्परा पर लगता जा रहा प्रशासनिक ग्रहण, भक्तों में नाराजगी

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महंत आवास से होगी माता गौरा की विदाई, इस क्षण का काशीवासियों को रहता है बेसब्री से इंतजार

बाबा और माता गौरा के साथ अबीर-गुलाल की होली खेलने के साथ काशी में विधिवत शुरू हो जाती है होली

वाराणसी, भदैनी मिरर। काशी विश्वनाथ धाम में 27 फरवरी को रंग भरी एकादशी मनाई जाएगी। काशीवासियों के लिए महाशिवरात्रि के बाद यह दूसरा बड़ा पर्व है। बाबा के साथ अबीर-गुलाल की होली के बाद काशी में विधिवत होली की शुरूआत हो जाती है। लेकिन इस बार काशी विश्वनाथ धाम में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। इस बार पालकी के साथ केवल 64 चिन्हित व्यक्तियों को ही प्रवेश मिलेगा। इसके साथ ही मंदिर परिसर में मोबाइल फोन प्रतिबंधित रहेंगे। न्यास द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम और जलपान की व्यवस्था की गई है। न्यास ने भक्तों से अनुशासन बनाए रखने का आग्रह गया है। लेकिन महज 64 चिन्हित लोगों को प्रवेश की अनुमति को लेकर काशीवासियों में तरह-तरह की प्रतिक्रिया है।

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आपको बता दें कि इस दिन काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत आवास से गवना की पालकी निकलती है। पालकी में भगवान शिव और माता पार्वती विराजमान रहते हैं जिनके साथ काशीवासी जमकर होली खेलते हैं। रंगभरी एकादशी को काशी की गलियों में करीब 10 क्विंटल से ज्यादा गुलाल उड़़ा दिये जाते हैं। इस दिन काशीवासी बाबा के साथ अबीर-गुलाल की होली खेलकर निहाल हो जाते हैं। इस अवसर का काशावसियों को एक साल से इंतजार रहता है। काशी में यह परम्परा सैकड़ों सालों से निरंतर चली आ रही है। इस दौरान महंत आवास माता गौरा का निवास स्थल बन जाता है। यहां गवना से पहले की सभी रस्में अदा की जाती हैं। रंगभरी एकादशी के दो दिन पहले यानी 24 फरवरी आज माता गौरा को हल्दी लगाने की रस्म निभाई जा रही है। श्रृंगार और अन्य उत्सव हो रहे हैं। महंत आवास ेमें माता गौरा के मायके का दृश्य उपस्थित है। रंगभरी एकादशी पर बाबा विश्वनाथ माता गौरा की विदाई के लिए यहां आते हैं।

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विदाई के रस्मों की अदायगी के बाद भगवान शिव माता गौरा का गवनां कराकर उन्हें पालकी में ले जाते हैं। यही वह अद्भुत क्षण होता है जब काशीवासी बाबा और माता गौरा के साथ होली खेलते हैं। गलियां खचाखच भर जाती हैं। यह उत्स देखने दूर-दराज से श्रद्धालु काशी आते हैं। आपको यह भी बता दें कि श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर पहले मंहत परिवार के कब्जे में था। अधिग्रहण के बाद यह सरकार के कब्जे में आ गया। चूंकि प्राचीन परम्परा के तहत महंत आवास में ही गौने की प्रकिया पूरी होती है और बाबा विदाई कराकर मंदिर तक जाते हैं। लेकिन रह-रहकर प्रशासनिक हस्तक्षेप से बाबा के भक्तों में नाराजगी भी है।
 

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