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नागरी पत्रिका बनी काशी की सांस्कृतिक चेतना की आवाज, परंपरा और आधुनिकता का सेतु: संकट मोचन मंच से विमोचन

संगीत समारोह में साहित्यिक विमर्श, विद्वानों ने बताया— परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु है “नागरी”

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वाराणसी। श्री संकट मोचन संगीत समारोह के दूसरे दिन साहित्य मंच पर नागरी प्रचारिणी सभा की प्रतिष्ठित पत्रिका “नागरी” का विमोचन हुआ। इस अवसर पर आयोजित परिचर्चा में काशी की परंपरा, लोक जीवन, भाषा और समकालीन बौद्धिकता पर गहन विमर्श हुआ। वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि “नागरी” केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि काशी की जीवंत सांस्कृतिक चेतना का दस्तावेज है।
Sankatmochan
हिन्दी के प्रख्यात आलोचक प्रो. श्री प्रकाश शुक्ल ने अपने सारगर्भित वक्तव्य में कहा कि यह पत्रिका किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरी काशी की है। उन्होंने कहा, “यह व्योमेश की पत्रिका नहीं, यह बनारस की पत्रिका है, क्योंकि व्योमेश बनारस में घुल गए हैं और बनारस उनमें बस गया है।” उन्होंने बनारसी स्वभाव को रेखांकित करते हुए कहा कि बनारसीपन स्वतंत्रता, अक्खड़ता और स्वाभाविक अभिव्यक्ति का प्रतीक है, जो इस पत्रिका में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
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उन्होंने पत्रिका को “असाधारण चित्त से उपजी संपादन कला” का परिणाम बताते हुए कहा कि इसमें काशी का भूगोल, लोक समाज और सांस्कृतिक बहुलता जीवंत रूप में उपस्थित है। यह पत्रिका बहुवचनात्मक स्वरूप लिए हुए है, जिसमें अनेक दृष्टिकोण और अनुभव एक साथ समाहित हैं। उन्होंने कहा कि काशी को अलग करके इस पत्रिका को समझा ही नहीं जा सकता।
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प्रो. शुक्ल ने कहा कि “नागरी” परंपरा और समकालीनता के बीच सेतु का कार्य करती है। इसमें परंपरा पृष्ठभूमि में रहते हुए वर्तमान को दिशा देती है। उन्होंने यह भी कहा कि जब परंपरा आनंदमूलक होती है, तभी समकालीन समाज लोकतांत्रिक बनता है और यही संतुलन इस पत्रिका में देखने को मिलता है।
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उन्होंने बनारस की बहुवचनात्मकता को पान के उदाहरण से समझाते हुए कहा कि बनारस बाहर से आने वाली हर चीज को अपने रंग में ढाल लेता है। यही गुण इस पत्रिका में भी दिखाई देता है। साथ ही उन्होंने संकट मोचन महोत्सव से जुड़े “पिटारी प्रसाद” जैसे प्रसंगों के माध्यम से पत्रिका की सांस्कृतिक गहराई को रेखांकित किया।
नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने अपने वक्तव्य में कहा कि यह पत्रिका काशी की शाश्वत परंपरा को शब्दों में अभिव्यक्त करने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि सभा इस माध्यम से अपने सर्जनात्मक जीवन के नए अध्याय में प्रवेश कर रही है। उनका उद्देश्य भाषा, साहित्य और नागरी लिपि को काशी की जीवित सांस्कृतिक परंपरा से जोड़ना है।
उन्होंने कहा, “हमारी कोशिश है कि काशी के अंतहीन आयामों को शब्दों के जरिए छू सकें।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह पत्रिका किसी विचार को थोपती नहीं, बल्कि संवाद और सहभागिता का आमंत्रण देती है।
डॉ. महेंद्र कुशवाहा ने कहा कि संगीत समारोह में साहित्य का समावेश अत्यंत महत्वपूर्ण और स्वागतयोग्य पहल है। उन्होंने कहा कि जिस परिसर में गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की, वहीं साहित्यिक विमर्श होना काशी की परंपरा का स्वाभाविक विस्तार है। उन्होंने “नागरी” को काशी की पुरानी परंपरा के “पुनर्नवा” स्वरूप के रूप में प्रस्तुत किया।
उन्होंने पत्रिका की छपाई, संपादन और संरचना की सराहना करते हुए कहा कि यह हिंदी की समकालीन पत्रिकाओं के लिए एक मानक बन सकती है। साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि यह पत्रिका भविष्य में हिंदी भाषा और लिपि के शुद्ध प्रयोग का प्रमाणिक स्रोत बने।
प्रो. विजय नाथ मिश्र ने अपने वक्तव्य में नागरी प्रचारिणी सभा के पास उपलब्ध दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण और प्रकाशन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इन पांडुलिपियों पर विशेष कार्य कर उन्हें समाज के सामने लाना अत्यंत आवश्यक है और “नागरी” इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
कार्यक्रम में यह बात उभरकर सामने आई कि “नागरी” पत्रिका काशी की बहुआयामी संस्कृति, उसकी परंपरा और आधुनिक चेतना के बीच एक सशक्त सेतु बनकर उभर रही है।
इनकी रही उपस्थिति
कार्यक्रम में प्रो. श्री प्रकाश शुक्ल, प्रो. विजय नाथ मिश्र, डॉ. महेंद्र कुशवाहा, व्योमेश शुक्ल, प्रो. वृंदा परांजपे, डॉ. अमित पाण्डेय, नीतू (गुजरात), वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा, कवि आर्यपुत्र दीपक, शश्वत, विनायक, मनीष खत्री, पुष्कर, राजेश, शशांक पाठक (आईआईटी बीएचयू), विजय विनीत, हरेंद्र शुक्ल, छायाकार अमन, अरविंद मिश्र, सौगत चक्रवर्ती सहित अनेक साहित्यकार, कलाकार और बुद्धिजीवी उपस्थित रहे।
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