पादुका शीश धरे रो पड़ीं आँखें... चित्रकूट से नंदीग्राम तक गूंजा भ्रातृ-प्रेम, अश्रुपूरित क्षणों के साथ अयोध्याकांड संपन्न
चित्रकूट से नंदीग्राम तक भाई-प्रेम की अमर गाथा; भरत कूप का निर्माण, प्रभु राम का 'मुखिया मुख सो चाहिए' का संदेश और अयोध्याकांड की लीला का विश्राम।
वाराणसी (भदैनी मिरर डेस्क): काशी की ऐतिहासिक और विश्वप्रसिद्ध रामनगर रामलीला के 14वें दिन रामलीला प्रेमी भाइयों के बीच बेहद भावुक और ज्ञानवर्धक प्रसंगों का मंचन हुआ। चित्रकूट की पावन धरा पर प्रभु श्रीराम और भरत जी के भ्रातृ-प्रेम तथा आदर्श राज्य व्यवस्था के संवाद ने श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके साथ ही श्रीरामचरितमानस के 'अयोध्याकांड' की लीला का भावपूर्ण समापन हुआ।

प्रभु राम ने दिया 'मुखिया मुख सो चाहिए' का अमर संदेश
लीला के दौरान प्रभु श्रीराम ने राजा और परिवार के प्रमुख के कर्तव्यों का बोध कराते हुए कहा कि राजा या प्रमुख को 'मुख' (मुँह) के समान होना चाहिए—जिस प्रकार मुख पूरे शरीर के हर अंग को समान रूप से पोषण पहुँचाता है, उसी प्रकार देश, समाज या परिवार के मुखिया को बिना किसी पक्षपात के अपने सभी परिजनों और प्रजा का पालन-पोषण करना चाहिए। संत तुलसीदास जी के इस गूढ़ विचार ने उपस्थित रामलीला प्रेमियों को गहराई से प्रभावित किया।
भरत कूप का निर्माण और आश्रम की परिक्रमा
कथा प्रसंग के अनुसार, भरत जी ने चित्रकूट दर्शन की इच्छा व्यक्त की, जिस पर श्रीराम ने उन्हें महर्षि अत्रि मुनि के साथ भेजा। भरत जी, शत्रुघ्न जी और निषादराज अलकनंदा नदी व अन्य रमणीय स्थलों के दर्शन करते हैं। इस दौरान अत्रि मुनि ने एक कूप का नाम 'भरत कूप' रखा, जिसमें भरत जी ने सभी तीर्थों का पवित्र जल प्रवाहित किया।
तत्पश्चात सभी ने प्रभु राम के आश्रम की परिक्रमा की। इस मनोरम दृश्य के साक्षी बनते हुए परिसर में उपस्थित सभी रामलीला प्रेमियों ने भी श्रद्धा भाव से परिक्रमा लगाई।
चरण पादुका सौंप विदाई का भावुक क्षण
परिक्रमा के बाद भरत जी ने प्रभु श्रीराम से उनकी चरण पादुका माँगी, जिसे भगवान राम ने सहर्ष प्रदान किया ("प्रभु करि कृपा पा वरी दिन्ही। सादर भरत सीस धरि लिन्ही।।")। भरत जी ने उस पावन पादुका को अपने सिर पर धारण किया। इसके बाद प्रभु राम, माता सीता और लक्ष्मण जी ने सभी माताओं, महाराज जनक, महारानी सुनैना, गुरुदेव और सखा निषादराज से भेंटकर उन्हें अश्रुपूरित नेत्रों से विदा किया।
देवताओं के आगमन पर श्रीराम ने उन्हें यह कहकर आश्वस्त किया कि वे उन्हीं के कार्य और लोक-कल्याण के लिए तत्पर हैं। दिन की पहली आरती महर्षि अत्रि मुनि जी द्वारा उतारी गई।
नंदीग्राम में पर्णकुटी और अयोध्याकांड का विश्राम
लीला के अंतिम चरण में भरत जी समस्त परिवारजन के साथ अयोध्या लौटे। वहाँ उन्होंने राज सिंहासन पर प्रभु श्रीराम की चरण पादुका को स्थापित किया और शत्रुघ्न जी को राज्य की देखभाल का उत्तरदायित्व सौंपा। माताओं और गुरुदेव से आज्ञा लेकर भरत जी अयोध्या की सीमा पर स्थित नंदीग्राम पहुँचे।
नंदीग्राम में पर्णकुटी (कुटिया) बनाकर भरत जी ने तपस्वी रूप में राम-नाम का सुमिरन शुरू किया और प्रभु के लौटने की राह देखने लगे। अंत में भरत जी की विशेष आरती के साथ लीला को विश्राम दिया गया।
त्याग, समर्पण, पिता-पुत्र, पति-पत्नी, भाई-भाई और राजा-प्रजा के अतुलनीय प्रेम का संदेश देने वाले 'अयोध्याकांड' का इसके साथ ही समापन हुआ।

