डिप्रेशन से देवotion तक: वाराणसी की मुस्लिम एडवोकेट की अनोखी आस्था-नमाज भी, महामृत्युंजय जाप भी
गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल, पति की मौत के बाद डिप्रेशन से उबरने की कहानी, कहा—“भोलेनाथ ने संभाला”
रिपोर्ट- स्मिता सरोज
वाराणसी। धर्म और आस्था की नगरी वाराणसी से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो गंगा-जमुनी तहजीब की जीवंत मिसाल बन गई है। गणेशपुर कॉलोनी (बीएलडब्ल्यू के पास) में रहने वाली सीनियर एडवोकेट नूर फातिमा ने वर्ष 2004-05 में यहां रुद्रेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण करवाया।


मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखने वाली नूर फातिमा घर में नमाज अदा करती हैं और मंदिर में भगवान शिव का जलाभिषेक भी करती हैं। उनका कहना है-“मंदिर हमने नहीं बनवाया, भगवान ने हमसे बनवाया है।”
पति की मौत के बाद टूटीं, फिर संभलीं
नूर फातिमा के अनुसार, जब वे अपने पति के साथ इस कॉलोनी में रहने आईं तो क्षेत्र में लगातार आकस्मिक मौतों की घटनाएं हो रही थीं। इसी दौरान उन्हें बार-बार बड़े मंदिरों के सपने आने लगे।
उनके पति मुराद अली, जो बीएलडब्ल्यू में इंजीनियर थे, एक सड़क हादसे में चल बसे। पति की मौत के बाद वे गहरे अवसाद में चली गईं।

भदैनी मिरर से बातचीत में उन्होंने कहा- “एक औरत का पति चला जाए तो उसकी जिंदगी जैसे खत्म हो जाती है। मैं भी डिप्रेशन में थी। फिर बाबा ने संभाला और जिंदगी दोबारा शुरू हुई।”

सपनों से शुरू हुआ मंदिर निर्माण
नूर फातिमा बताती हैं कि उन्हें सपने में ऊंचे-ऊंचे मंदिर दिखाई देते थे, जहां वे सफेद माला चढ़ा रही हैं। पहले उन्होंने इन सपनों को नजरअंदाज किया, लेकिन जब क्षेत्र में अनहोनी घटनाएं बढ़ीं तो उन्होंने मंदिर निर्माण का संकल्प लिया।
नवंबर 2004 में शिलान्यास हुआ और 8 मार्च 2005 को मंदिर का उद्घाटन कर दिया गया। मात्र तीन महीने में मंदिर बनकर तैयार हो गया।

आज यहां कॉलोनी के लोग नियमित पूजा-पाठ, कीर्तन और धार्मिक आयोजन करते हैं। हाल ही में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन भी हुआ, जिसमें अधिवक्ताओं और स्थानीय लोगों की बड़ी भागीदारी रही।

घर में अल्लाह, मंदिर में महादेव
नूर फातिमा कहती हैं कि वे घर में नमाज अदा करती हैं और मंदिर में भगवान शिव को जल चढ़ाती हैं। उन्हें महामृत्युंजय मंत्र, गायत्री मंत्र और हनुमान चालीसा भी कंठस्थ है।
वे बताती हैं कि उन्होंने महामृत्युंजय मंदिर, काशी विश्वनाथ मंदिर, मंगला गौरी और चामुंडा देवी जैसे मंदिरों में भी दर्शन किए हैं।
उनका स्पष्ट संदेश है- “जात-धर्म से ऊपर उठकर इंसानियत का धर्म अपनाइए। हिंदू-मुस्लिम अलग नहीं हैं। नफरत नेताओं द्वारा फैलाई जाती है, आम लोग मिलकर रहना चाहते हैं।”

समाज का मिला सहयोग, नहीं हुई आलोचना
नूर फातिमा का कहना है कि मंदिर निर्माण के दौरान किसी ने विरोध नहीं किया। हिंदू और मुस्लिम, दोनों समाज के लोगों ने सहयोग दिया।
स्थानीय अधिवक्ताओं के अनुसार, “जब एक मुस्लिम महिला मंदिर बनवा रही थी, तब हिंदू समाज ने भी सहयोग किया। यह काशी के लिए बड़ी मिसाल है।”
गंगा-जमुनी तहजीब की जीवंत मिसाल
धार्मिक सौहार्द की मिसाल बनी यह कहानी बताती है कि काशी की आत्मा आज भी समावेशी है। नूर फातिमा का मानना है कि मजहबी नफरत देश की तरक्की में बाधा है।
वे कहती हैं-“हम सब हिंदुस्तानी हैं। मिलकर देश को आगे बढ़ाएं। मोहब्बत से रहना ही असली धर्म है।”
