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भट्ठों से जलवायु तक: वाराणसी में ईंट भट्ठा मजदूरों के दर्द और संघर्ष को 'जलवायु संवाद' के केंद्र में लाने की बड़ी पहल

चंबल मीडिया की 'बुनियाद' पहल के तहत जुटे एक्सपर्ट्स; पेश होगा 'चार्टर ऑफ डिमांड्स' और सजेगी ग्राउंड रिपोर्टिंग की अनूठी कहानियां

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वाराणसी (भदैनी मिरर): जलवायु परिवर्तन (Climate Change) पर अक्सर बड़े-बड़े वैश्विक सम्मेलनों, प्रदूषण के आंकड़ों और नीतिगत स्तरों पर ही चर्चा सीमित रह जाती है. लेकिन मौसम के इस बदलते मिजाज का सबसे तीखा और गहरा असर उन गरीब समुदायों पर पड़ रहा है, जो खुले आसमान के नीचे कठिन शारीरिक श्रम करते हैं. इसी बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दे को मुख्यधारा की चर्चा में लाने के लिए चंबल मीडिया द्वारा वाराणसी में 'बुनियाद' पहल के अंतर्गत एक विशेष कार्यक्रम “तपते भट्ठे, बदलता मौसम: जमीनी कहानियाँ और जलवायु संवाद” का आयोजन किया जा रहा है.

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इस अनूठे आयोजन का मुख्य उद्देश्य ईंट भट्ठा समुदायों के रोजमर्रा के जीवन, उनके संघर्षों और पर्यावरण में आ रहे बदलावों के अनुभवों को नीति निर्माताओं और सार्वजनिक पटल के केंद्र में स्थापित करना है.


आयोजन की पृष्ठभूमि: आखिर क्यों पड़ी ऐसी पहल की जरूरत?

ईंट भट्ठा मजदूर समाज का वह हाशिए पर खड़ा तबका है जो चिलचिलाती धूप, बढ़ती गर्मी, बेमौसम और अनपेक्षित बारिश के बीच लंबे समय तक गर्म वातावरण में काम करने को मजबूर है. मौसम के बदलते चक्र के कारण इनका पलायन बढ़ता है, स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित होती हैं और सामाजिक सुरक्षा का भारी अभाव रहता है.

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इन तमाम विसंगतियों के बावजूद, इन मजदूरों के अनुभवों को मुख्यधारा की जलवायु रिपोर्टिंग और सार्वजनिक विमर्श में बेहद कम जगह मिलती है. 'बुनियाद' पहल इसी खाई को पाटने की एक कोशिश है, ताकि ईंट भट्ठा समुदायों के श्रम अधिकारों, जलवायु न्याय, बेहतर स्वास्थ्य और सम्मानजनक कामकाजी परिस्थितियों पर एक गंभीर व सार्थक संवाद स्थापित किया जा सके.

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पेश होगा 'चार्टर ऑफ डिमांड्स' 

पिछले एक वर्ष के दौरान 'बुनियाद' पहल ने समुदायों, पत्रकारों, शोधकर्ताओं और सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर जमीनी हकीकत को बारीकी से समझा है. इसी गहन शोध और अनुभवों के आधार पर तैयार किया गया 'चार्टर ऑफ डिमांड्स' इस कार्यक्रम के दौरान प्रस्तुत किया जाएगा. इस चार्टर में मुख्य रूप से इन मांगों को प्रमुखता से शामिल किया गया है:

* मजदूरों के लिए सुरक्षित, स्वच्छ और बेहतर कामकाजी परिस्थितियाँ.
* श्रम अधिकारों का जमीनी स्तर पर प्रभावी पालन.
* भट्ठा क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य और बच्चों के लिए शिक्षा तक सुलभ पहुँच.
* प्रवासी मजदूरों के लिए पुख्ता सामाजिक सुरक्षा नीतियां.
* पारदर्शी व सरल लाइसेंसिंग व्यवस्था के साथ पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ (Eco-Friendly) तकनीकों को बढ़ावा देना.


कहानी कहने का अंदाज: युवाओं का 'क्लाइमेट विज़ुअल मैप'


इस पहल का एक सबसे खूबसूरत हिस्सा समुदाय आधारित 'नैरेटिव बिल्डिंग' और मीडिया प्रशिक्षण है. 'चंबल अकादमी' द्वारा कानपुर देहात में 'उड़ान फेलोशिप' के माध्यम से 15 ईंट भट्ठा और अन्य हाशिये के समुदायों के युवाओं को दो वर्षों में मोबाइल पत्रकारिता की बारीकियां सिखाई गई हैं.

इन युवाओं द्वारा तैयार की गई रिपोर्टें जलवायु परिवर्तन को किसी अमूर्त या वैज्ञानिक फार्मूले की तरह नहीं, बल्कि भूख, गर्मी, रोजगार, पलायन, जाति और जेंडर के चश्मे से रोजमर्रा के जीवन संघर्ष के रूप में सामने लाती हैं. कार्यक्रम में एक 'क्लाइमेट विज़ुअल मैप' (Climate Visual Map) भी पेश किया जाएगा, जो समुदायों की यादों और पर्यावरण में आ रहे बदलावों को एक स्टोरीटेलिंग प्रोजेक्ट के रूप में दर्ज करता है.


विशेषज्ञों और मजदूरों के बीच सजेगी राउंडटेबल चर्चा

कार्यक्रम के दौरान एक विशेष राउंडटेबल (गोलमेज) चर्चा का आयोजन होगा, जिसमें देश भर के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार, जलवायु विशेषज्ञ, समाजशास्त्री, शोधकर्ता, फेलोज़ और स्वयं ईंट भट्ठा मजदूर व समुदाय के प्रतिनिधि एक साथ बैठेंगे. चर्चा में मुख्य रूप से श्रम परिस्थितियाँ, पलायन, आर्थिक स्थिरता, तथा जेंडर और जाति से जुड़े मुद्दों पर मंथन होगा.

इसके अलावा, फिल्म स्क्रीनिंग और सहभागी चर्चाओं के जरिए मीडिया, नीति निर्माताओं और जमीनी समुदायों के बीच एक मजबूत सेतु बनाने का प्रयास किया जाएगा.