"ताने सहकर भी नहीं मानी हार: बनारस की उर्मिला पटेल ने घूंघट की आड़ से लिखी कामयाबी की नई इबारत"
स्वयं सहायता समूह (SHG) से जुड़कर दर्जनों ग्रामीण महिलाओं को दिया रोजगार और नया आत्मविश्वास।
वाराणसी (भदैनी मिरर)। कहते हैं कि अगर इरादे बुलंद हों, तो कोई भी रुकावट तरक्की की राह नहीं रोक सकती। इसे सच कर दिखाया है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के आराजीलाइन विकासखंड स्थित गाजीपुर गांव की रहने वाली उर्मिला पटेल ने। कभी घूंघट की आड़ में सिमटी रहने वाली उर्मिला आज न सिर्फ अपने परिवार की आर्थिक रीढ़ बन चुकी हैं, बल्कि पूरे इलाके के लिए महिला सशक्तिकरण की एक जलती हुई मशाल हैं।


कच्चा मकान, अनिश्चित आय और समाज के ताने
कॉलेज तक शिक्षित होने के बावजूद उर्मिला का जीवन एक बड़े संयुक्त परिवार के कच्चे मकान और चारदीवारी के बीच बीत रहा था। उनके पति मनोज कुमार दिहाड़ी मजदूरी करते थे। काम और आय अनिश्चित होने के कारण परिवार के सामने हर दिन आर्थिक तंगी का संकट खड़ा रहता था।
इसके अलावा, गांव में गहरी रची-बसी 'घूंघट प्रथा' और रूढ़िवादी सोच महिलाओं के कदम बाहर नहीं निकलने देती थी। जब उर्मिला ने अपने परिवार की मदद के लिए बाहर निकलने और बैठकों में हिस्सा लेने का फैसला किया, तो उन्हें समाज के तीखे तानों और आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। लेकिन उर्मिला ने हार मानने के बजाय इन मुश्किलों को ही अपनी ताकत बना लिया।


जुलाई 2017: वह फैसला जिसने बदल दी जिंदगी की दिशा
परिवार को आर्थिक तंगी के दलदल से निकालने के लिए उर्मिला ने जुलाई 2017 में स्वयं सहायता समूह (Self-Help Group - SHG) से जुड़ने का फैसला लिया। यह कदम उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
समूह से जुड़ने के बाद उर्मिला को मिलीं ये बड़ी सीख:

1. वित्तीय प्रबंधन: छोटी-छोटी बचत करने और पैसों के सही इस्तेमाल का हुनर।
2. नेतृत्व क्षमता: सामुदायिक बैठकों में खुलकर अपनी बात रखना और फैसले लेना।
3. स्वरोजगार के अवसर: नए कामों के जरिए खुद की आय शुरू करने की तकनीक।
तंगहाली से खुशहाली का सफर: अन्य महिलाओं का भी बनीं सहारा
धीरे-धीरे उर्मिला ने बैंकिंग प्रक्रिया, बचत और आजीविका के साधनों को सीखा। इसके दम पर उन्होंने अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को पटरी पर लाया। लेकिन उनकी सोच सिर्फ अपने घर तक सीमित नहीं रही।
आत्मविश्वास से लबरेज उर्मिला ने गांव की उन महिलाओं को संगठित करना शुरू किया जो कभी घर से बाहर निकलने से डरती थीं। उन्होंने गांव-गांव जाकर महिलाओं को स्वयं सहायता समूह के फायदों के बारे में समझाया और उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने के लिए प्रेरित किया।
ग्रामीण भारत में बदलाव का नया प्रतीक
आज उर्मिला पटेल की यह संघर्षपूर्ण और सफ़ल यात्रा इस बात का जीता-जागता सबूत है कि अगर ग्रामीण भारत की महिलाओं को सही अवसर, वित्तीय मार्गदर्शन और प्रोत्साहन मिले, तो वे समाज की सोच को भी बदल सकती हैं और आर्थिक प्रगति की नई कहानी भी लिख सकती हैं।
उर्मिला की यह कहानी आज बनारस ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने की राह दिखा रही है।
