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BHU में विवाद: महिला आयोग में कुलपति द्वारा नामित प्रतिनिधि पर उठे सवाल, छात्र बोले– जिन पर खुद लगे हो आरोप वह कैसे रखेगा पक्ष?

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में महिला उत्पीड़न के मामलों को लेकर कुलपति द्वारा नामित प्रतिनिधियों पर छात्रों ने उठाया सवाल, एक सदस्य पर पूर्व में दर्ज है FIR, आयोग से की निष्पक्ष जांच की मांग।

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वाराणसी, भदैनी मिरर। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) एक बार फिर विवादों में घिर गया है। विश्वविद्यालय में महिला उत्पीड़न के तीन मामलों में राष्ट्रीय महिला आयोग में सुनवाई से पूर्व कुलपति द्वारा नियुक्त प्रतिनिधियों में से एक पर गंभीर आरोप लगे हैं। छात्रों और विश्वविद्यालय के कई सदस्यों ने ईमेल के माध्यम से इसपर आपत्ति जताई है और आयोग से निष्पक्ष सुनवाई की मांग की है।
सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रीय महिला आयोग ने BHU के कुलपति को 14 जुलाई 2025 को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया था, परंतु कुलपति ने अपने स्थान पर तीन सदस्यों को आयोग में भेजने का निर्णय लिया। इनमें से एक हैं प्रो. रोयाना सिंह, जो महिला उत्पीड़न के केस नंबर 8/14804/2022/NCW/MEM/HK की मुख्य आरोपित हैं।
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छात्रों ने अपने ईमेल में लिखा है कि जिस व्यक्ति पर खुद गंभीर आरोप लगे हों, वह विश्वविद्यालय की ओर से प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है? यह नैतिकता और पारदर्शिता के खिलाफ है। डॉ. कुंवर पुष्पेंद्र प्रताप सिंह, अभय सिंह मीकू, हर्ष तिवारी, मृत्युंजय तिवारी, शुभम तिवारी समेत कई छात्रों ने इसपर कड़ी आपत्ति जताई है।
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उन्होंने कुलपति और विश्वविद्यालय प्रशासन को ईमेल के ज़रिए पत्र भेजकर कहा है कि अगर नामित प्रतिनिधियों की सूची में संशोधन नहीं किया गया, तो इससे BHU की छवि राष्ट्रीय स्तर पर धूमिल होगी।
इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय महिला आयोग को भेजे गए पत्र में छात्रों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि कुलपति जानबूझकर दोषियों को संरक्षण दे रहे हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि प्रो. रोयाना सिंह पर 2018 में छात्रा के साथ मारपीट का मुकदमा दर्ज है। यह FIR वाराणसी के लंका थाने में दर्ज हुई थी, जिसमें लिखा है कि छात्रा को इतनी चोट लगी कि ऑपरेशन तक की नौबत आ गई।
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विवादित नामों में एक अन्य मामला प्रो. सौरभ सिंह से जुड़ा है, जिन पर भी उत्पीड़न का आरोप है, लेकिन जांच रिपोर्ट अब तक नहीं आई। इससे स्पष्ट होता है कि BHU प्रशासन इन गंभीर मामलों में लापरवाही बरत रहा है।
छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय की गरिमा बचाने के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग को इस पर स्वतः संज्ञान लेकर कुलपति से जवाबदेही तय करनी चाहिए।
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