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UGC के नए विनियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, BHU छात्र नेता मृत्युंजय तिवारी की याचिका दाखिल

जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा सीमित करने पर सवाल, अनुच्छेद 14, 15 और 21 के उल्लंघन का आरोप

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नई दिल्ली,वाराणसी/भदैनी मिरर| काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के छात्र नेता एवं बलिया (उत्तर प्रदेश) निवासी मृत्युंजय तिवारी ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा अधिसूचित नए विनियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत अधिवक्ता नीरज सिंह के माध्यम से दायर की गई है।

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याचिका का शीर्षक “मृत्युंजय तिवारी बनाम भारत संघ” है, जो वर्ष 2026 की डायरी संख्या 4985/2026 के रूप में पंजीकृत की गई है। इसमें UGC (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता का संवर्धन) विनियम, 2026 के विनियम 3(ग) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है, जिसे 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया गया था।

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क्या है याचिका का मुख्य मुद्दा

याचिका में कहा गया है कि विनियम 3(ग) “जाति-आधारित भेदभाव” को केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तक सीमित करता है। इसके चलते सामान्य या गैर-अनुसूचित वर्ग के छात्र एवं नागरिक-even यदि वे जाति-आधारित उत्पीड़न का सामना करते हों—किसी भी कानूनी संरक्षण से वंचित रह जाते हैं।

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असंवैधानिक वर्गीकरण का आरोप

छात्र नेता मृत्युंजय तिवारी का तर्क है कि यह प्रावधान—

  • पीड़ितों का कृत्रिम और असंवैधानिक वर्गीकरण करता है,
  • यह मान लेता है कि जाति-आधारित भेदभाव केवल एक ही दिशा में संभव है,
  • और इस प्रकार संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव निषेध) एवं अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का उल्लंघन करता है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला

याचिका में इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) सहित सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि “जाति” और “वर्ग” समान अवधारणाएं नहीं हैं। केवल कुछ वर्गों तक जाति-आधारित भेदभाव को सीमित करना न्यायसंगत नहीं बल्कि मनमाना और असंवैधानिक है।

छात्रों पर पड़ने वाला प्रभाव

याचिका में यह भी कहा गया है कि JNU, दिल्ली विश्वविद्यालय और अशोका विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थानों में सामान्य वर्ग के छात्रों के खिलाफ भी जाति-आधारित शत्रुता और उत्पीड़न के उदाहरण सामने आए हैं। हालांकि, UGC के नए विनियम ऐसे मामलों में किसी प्रभावी शिकायत-निवारण तंत्र की व्यवस्था नहीं करते।

इससे छात्रों की अकादमिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(क)), मानसिक स्वास्थ्य और गरिमा के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट से की गई मांग

छात्र नेता मृत्युंजय तिवारी ने अपने अधिवक्ता नीरज सिंह के माध्यम से माननीय सर्वोच्च न्यायालय से मांग की है कि—

  • UGC विनियम 3(ग) को, जहाँ तक वह “जाति-आधारित भेदभाव” की परिभाषा को सीमित करता है, असंवैधानिक घोषित कर निरस्त किया जाए;

  या

  • उक्त प्रावधान में संशोधन का निर्देश दिया जाए, ताकि किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध—उसकी जाति की परवाह किए बिना—जाति-आधारित भेदभाव को शामिल किया जा सके और वास्तविक समानता व समावेशन सुनिश्चित हो सके।
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