BHU: खेल मैदानों की ₹8.61 लाख की बुकिंग राशि पर उठे सवाल, RTI के बाद अधिकारियों को भेजी गई विधिक नोटिस
क्रीड़ा परिषद को दो वर्षों में मिली लाखों की राशि, लेकिन मैदानवार व संस्थावार विवरण न मिलने पर हाईकोर्ट के अधिवक्ता ने मांगा जवाब
वाराणसी, भदैनी मिरर। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) के खेल मैदानों के इस्तेमाल और उनकी बुकिंग से प्राप्त राजस्व को लेकर वित्तीय व प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिली अधूरी जानकारी के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधिवक्ता संतोष कुमार त्रिपाठी ने बीएचयू क्रीड़ा परिषद की महासचिव, अपीलीय प्राधिकारी, मैदान प्रभारियों और चिकित्सा विज्ञान संस्थान के निदेशक को विधिक नोटिस भेजकर 15 दिनों के भीतर पूरा ब्योरा मांगा है।


RTI में हुआ खुलासा: ₹8.61 लाख का हिसाब अधूरा
अधिवक्ता संतोष कुमार त्रिपाठी द्वारा दाखिल आरटीआई आवेदन के जवाब में बीएचयू क्रीड़ा परिषद ने स्वीकार किया कि बीते दो वित्तीय वर्षों में खेल मैदानों की बुकिंग से कुल ₹8,61,000 की राशि प्राप्त हुई है।
- वर्ष 2024-25: ₹5,19,500
- वर्ष 2025-26: ₹3,41,500
हालांकि, इस जवाब में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यह राशि किस मैदान से, किस तारीख को, किस संस्था या व्यक्ति से किस उद्देश्य के लिए वसूल की गई है। विस्तृत रिकॉर्ड और दस्तावेज उपलब्ध न कराने के कारण यह मामला अब कानूनी मोड़ ले चुका है।

नीति और दावों में परस्पर विरोधाभास
नोटिस में बीएचयू प्रशासन के दोहरे रवैये पर भी सवाल उठाए गए हैं:
* बाहरी प्रवेश बनाम व्यावसायिक बुकिंग: क्रीड़ा परिषद का कहना है कि गैर-बीएचयू प्रतिभागियों को मैदानों में प्रवेश की अनुमति नहीं है, लेकिन दूसरी ओर बाहरी व्यावसायिक एजेंसियों को किराए पर मैदान उपलब्ध कराए जा रहे हैं।


- शुल्क निर्धारण का आधार: 7 अगस्त 2025 को जारी दर सूची में बाहरी संस्थाओं के लिए व्यावसायिक मैच व प्रतियोगिताओं की दरें तय हैं, परंतु इस नीति की प्रशासनिक मंजूरी व इसके तहत हुई बुकिंग का कोई लिखित ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया गया।
- ब्रोचा व रहिया ग्राउंड का मामला : ब्रोचा मैदान को अकादमियों को आवंटित करने से जुड़े नियमों और समझौतों की प्रतियां मांगी गई हैं। वहीं रुहिया ग्राउंड के संबंध में सही जानकारी न देकर इसे केवल चिकित्सा विज्ञान संस्थान के अधीन बता दिया गया, जिसके बाद संस्थान के निदेशक को भी अलग से नोटिस भेजा गया है।
15 दिनों में मांगा जवाब, CIC जाने की तैयारी
अधिवक्ता संतोष कुमार त्रिपाठी का कहना है कि विश्वविद्यालय के सार्वजनिक संसाधनों के इस्तेमाल और उनसे अर्जित राजस्व में पूर्ण पारदर्शिता होनी चाहिए। यदि नोटिस मिलने के 15 दिनों के भीतर मांगी गई सूचनाएं और अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध नहीं कराई जाती हैं, तो इस मामले को केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के समक्ष द्वितीय अपील और अन्य कानूनी मंचों पर ले जाया जाएगा।
