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BHU मेडिकल सुपरिंटेंडेंट भर्ती प्रक्रिया पहुंची हाईकोर्ट, नियमों की अनदेखी और अयोग्य उम्मीदवारों को लाभ देने का आरोप

छात्र नेता मृत्युंजय तिवारी ने दायर की जनहित याचिका; विज्ञापन में तय '7 साल के अस्पताल प्रबंधन अनुभव' की शर्तों के उल्लंघन का दावा।

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वाराणसी (भदैनी मिरर)। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (IMS) में मेडिकल सुपरिंटेंडेंट (MS) के पद पर चल रही स्थायी भर्ती प्रक्रिया अब कानूनी विवादों में घिर गई है। विश्वविद्यालय द्वारा जारी विज्ञापन और शॉर्टलिस्टिंग प्रक्रिया को नियमों के विपरीत बताते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। छात्र नेता मृत्युंजय तिवारी द्वारा दायर इस याचिका में भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं।

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क्या है मुख्य विवाद? '7 वर्ष का अनिवार्य अनुभव' गायब

याचिकाकर्ता के अनुसार, BHU द्वारा जारी विज्ञापन में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि अभ्यर्थी के पास 300 या उससे अधिक बेड वाले अस्पताल के प्रशासन का, वरिष्ठ पद पर न्यूनतम 7 वर्ष की अवधि का अनुभव होना चाहिए। यह एक 'अनिवार्य पात्रता' (Essential Qualification) है, न कि केवल 'वांछनीय' (Desirable)।

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आरोप है कि विश्वविद्यालय द्वारा जारी की गई 14 उम्मीदवारों की शॉर्टलिस्ट में अधिकांश के पास यह अनिवार्य अनुभव नहीं है। इसके विपरीत, विभागाध्यक्ष (HOD), प्रोफेसर इंचार्ज और नोडल अधिकारी जैसे पदों के अनुभव को ही अस्पताल प्रशासन के समकक्ष मान लिया गया है, जो कि व्यावहारिक और प्रशासनिक रूप से पूरी तरह अलग जिम्मेदारियां हैं।

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14 में से 13 इन-हाउस उम्मीदवार, त्रिपक्षीय समझौते के उल्लंघन का आरोप

जनहित याचिका में भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता पर कई बड़े सवाल उठाए गए हैं:

  • आंतरिक उम्मीदवारों को तरजीह: शॉर्टलिस्ट किए गए 14 उम्मीदवारों में से 13 उम्मीदवार IMS-BHU के ही आंतरिक (इन-हाउस) हैं, जिससे बाहरी योग्य अभ्यर्थियों को समान अवसर न मिलने की आशंका जताई गई है।

  • त्रिपक्षीय समझौते की अनदेखी: भारत सरकार (स्वास्थ्य मंत्रालय व शिक्षा मंत्रालय) और BHU के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते के तहत IMS-BHU को AIIMS मॉडल पर विकसित किया जाना है। याचिका में आरोप है कि वर्तमान विज्ञापन और चयन प्रक्रिया AIIMS संस्थानों में अपनाई जाने वाली प्रणाली से पूरी तरह अलग है।

  • नियमों में बीच में ढील: कानूनन चयन प्रक्रिया शुरू होने के बाद नियमों या पात्रता शर्तों में व्यावहारिक शिथिलता नहीं दी जा सकती। यदि ऐसा किया गया है, तो यह नियम बदलने के समान है।

  • डिग्री बनाम व्यावहारिक अनुभव: कुछ उम्मीदवारों के पास दूरस्थ शिक्षा (Distance Education) से प्राप्त MHA/MBA की डिग्री है, लेकिन याचिका के अनुसार यह डिग्री 300 बेड वाले अस्पताल के वास्तविक प्रशासनिक अनुभव का विकल्प नहीं हो सकती।

"व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि पारदर्शिता की लड़ाई"

याचिकाकर्ता मृत्युंजय तिवारी का साफ कहना है कि यह याचिका किसी व्यक्ति विशेष या किसी उम्मीदवार के खिलाफ नहीं है। इसका मुख्य उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि देश के इतने प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के सार्वजनिक पदों पर नियुक्तियां घोषित पात्रता शर्तों, विधि के शासन तथा संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के तहत पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता से हों।

याचिका के जरिए माननीय उच्च न्यायालय से इस पूरी भर्ती प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा करने और चयन प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी व गैर-मनमाना बनाने की प्रार्थना की गई है।