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वाराणसी में पत्रकारों पर दर्ज एफआईआर के खिलाफ अधिवक्ता सौरभ तिवारी का विरोध, कहा– संविधान विरोधी कार्रवाई

बीएचयू सिंह द्वार वीडियो पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर IT एक्ट और BNS की धाराओं में मुकदमे पर उठाए सवाल, प्रेस की स्वतंत्रता पर बताया हमला

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Advocate Saurabh Tiwari
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वाराणसी, भदैनी मिरर। बीएचयू सिंह द्वार स्थित पंडित मदन मोहन मालवीय जी की प्रतिमा पर वायरल हुए एक वीडियो को लेकर रिपोर्टिंग करने वाले 6 पत्रकारों पर एफआईआर दर्ज किए जाने के मामले में अब विधिक मोर्चे से विरोध शुरू हो गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ तिवारी ने शुक्रवार को एक प्रेस वक्तव्य जारी कर इस कार्रवाई को गैरकानूनी और लोकतंत्र विरोधी बताया है। उन्होंने इसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1) और प्रेस की स्वतंत्रता का सीधा उल्लंघन करार दिया।

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क्या है मामला?

एफआईआर संख्या 230/2025, थाना लंका, वाराणसी में हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और एक स्थानीय टीवी चैनल के पत्रकारों पर BNS, 2023 की धारा 356(3) और 196(1), तथा IT एक्ट की धारा 67 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। यह एफआईआर उस वायरल वीडियो के आधार पर दर्ज हुई जिसमें दो युवक (संभवत: एक नाबालिग) मालवीय प्रतिमा पर चढ़े दिखाई दे रहे हैं। प्रथम दृष्टया इसे रील बनाने की कोशिश बताया गया था।

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अधिवक्ता सौरभ तिवारी की आपत्ति

सौरभ तिवारी ने कहा कि—

“पत्रकारों का इरादा न तो पंडित मालवीय जी की छवि को धूमिल करने का था और न ही उन्होंने किसी धर्म, जाति या समूह के बीच वैमनस्य फैलाने का प्रयास किया। उन्होंने सिर्फ वीडियो को व्हाट्सएप ग्रुप में प्रशासनिक कार्रवाई की उम्मीद से साझा किया।”

उन्होंने स्पष्ट किया कि BNS की धारा 356(3) और 196(1) जैसी धाराओं की कोई कानूनी प्रयोज्यता इस मामले में नहीं बनती है।

उन्होंने यह भी जोड़ा कि—

“यदि मालवीय जी की प्रतिमा की सफाई वीवीआईपी आगमन से पहले हो रही थी, तो पीडब्ल्यूडी को क्रेन या उचित सीढ़ी की व्यवस्था करनी चाहिए थी, न कि युवकों को कंधों पर खड़ा कर प्रतिमा की सफाई कराई जाती।”

संवैधानिक संदर्भ और इतिहास की पुनरावृत्ति

सौरभ तिवारी ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि–

“ब्रिटिश काल में भी पत्रकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने के लिए प्रेस एक्ट लागू किए गए थे। आज जब लोकतंत्र है, तब भी पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज करना अत्यंत खेदजनक है।”

उन्होंने 1931 के Indian Press (Emergency Powers) Act और अनुच्छेद 19(2) का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में पत्रकारों ने कोई भी गैरकानूनी कार्य नहीं किया है।

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अधिवक्ता सौरभ तिवारी ने प्रशासन से मांग की है कि पत्रकारों पर दर्ज एफआईआर को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को मीडिया की स्वतंत्रता और संविधान में निहित मूल अधिकारों को लेकर संवेदनशील बनाया जाए।

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