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नहीं रहे निष्पक्ष, निर्भीक और मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता के बेताज बादशाह गोपेश पांडेय

रविवार की सुबह नवाबगंज स्थित आवास पर हुआ निधन, शाम को हरिश्चंद्र घाट पर अंतिम संस्कार

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gopesh ji
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पत्रकारों, सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के लोग हुए अंतिम यात्रा में शामिल, निधन की खबर से शोक की लहर

वाराणसी,भदैनी मिरर। काशी के दिग्गज पत्रकार, काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष एवं मानद सदस्य गोपेश पांडेय का रविवार की सुबह उनके नवाबगंज (दुर्गाकुंड) स्थित आवास पर निधन हो गया। वे 73 वर्ष के थे। पिछले तीन दिन से उनकी तबियत बिगड़ गई थी। उनका अंतिम संस्कार शाम को हरिश्चंद्र घाट पर हुआ। मुखाग्नि छोटे भाई शिवेश पांडेय ने दी। गोपेश पांडेय की धर्मपत्नी का निधन पहले ही हो चुका है। वह तीन भाइयों, दो बेटियों, भतीजे-भतीजियों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनके निधन से पत्रकारिता जगत शोक में डूब गया है। निष्पक्ष, निर्भीक और मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता के लिए जाने-जानेवाले गोपेश पांडेय का अवसान पत्रकारिता की अपूरणीय क्षति है। उनके निधन की खबर ही पत्रकारिता के अलावा सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों में शोक की लहर दौड़ गई। उनके निधन की खबर मिलते ही लोग उनके आवास पहुंचने लगे। शवयात्रा में काशी के पत्रकारों के अलावा सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के लोग शामिल हुए और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। 

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गोपेश पांडेय बनारस में खबर की दुनिया के बेताज बादशाह रहे। सत्तर के दशक में बीएचयू छात्र जीवन से ही वह पत्रकारिता में आने का मन बना चुके थे। बनारस की पत्रकारिता पूर्वांचल को प्रभावित करती है। उन्होंने आजीवन पत्रकारिता के मूल्यों से समझौता नही किया। गोपेश पांडेय का एक वह भी दौर लोगों को याद है कि उनसे राजनीतिक खेमों में अच्छे अच्छे लोग और नौकरशाह घबराते थे। ईमानदारी और सत्यनिष्ठा की प्रतिमूर्ति थे। विशुद्ध पत्रकारिता उनके रोम-रोम में रची बसी थी। उनकी यही खासियत रही कि उन्हें भरपूर यश और सम्मान मिला। उन्होंने अपने पत्रकारीय जीवन में बहुत से उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन कभी झुके नही। अपने जूनियरों को भी सत्यनिष्ठ पत्रकारिता के प्रति प्रेरित करते रहे। अपनी कलम में ताकत से वह बेताज बादशाह बने रहे। उनके पत्रकारीय जीवन के दौर में बनारस में तैनात रहे अधिकारी आज भी गोपेश पांडेय को जरूर याद करते है। हालत यह थी कि लखनऊ से जिस अधिकारी का तबादला बनारस हुआ तो वह अपने सीरियर अफसरों से सलाह लेते रहे। उन्हें यही सलाह मिलती रही कि बनारस अच्छी जगह है। जाना तो गोपेश पांडेय से जरूर मिल लेना।

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सच्चाई के पक्ष में खड़े रहना, सत्ता और व्यवस्था से सवाल पूछना और आम जन की आवाज़ को प्रमुखता से उठाना उनकी पहचान रही। काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संगठन को मजबूती दी और पत्रकारों के हितों की लड़ाई को मर्यादित, लेकिन दृढ़ स्वर में आगे बढ़ाया। संघ की सदस्यता के मामले में वह काफी सख्त थे। विधान से इतर किसी को सदस्यता देने के पक्ष में नही रहते। उनके अध्यक्षीय कार्यकाल के किस्से आज भी हमलोग सुनते और सुनाते रहते है। एक बार उन्होंने एकसाथ करीब सौ लोगों की सदस्यता खारिज कर दी। इससे हलचल मच गई थी। जिन लोगों की सदस्यता खारिज हुई उनमें उनके करीबी मित्रों, जूनियरों की संख्या ही ज्यादा थी। लेकिन उन्होंने सम्बंधों की वजाय संघ के विधान को सर्वोच्च माना। उनके दौर के पत्रकार आज भी उनको अपना गार्जियन मानते हैं और उनके बताये मार्ग पर चलने का प्रयास करते हैं। पत्रकारों के मार्गदर्शक के रूप में उन्होंने नई पीढ़ी को पत्रकारिता के मूल्यों से परिचित कराया। उनका सादा जीवन, स्पष्ट विचार और निर्भीक लेखनी हमेशा प्रेरणा देती रही। गोपेश पांडेय पत्रकारिता के स्तंभ थे। उनके जाने से पत्रकारिता में जो खालीपन आया उसकी भरपाई मुश्किल है। 
सोशल मीडिया पर भी उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा रहा। गोपेश पांडेय का योगदान काशी की पत्रकारिता के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया। 

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गोपेश पांडेय ने ’आज’ अखबार में पत्रकारिता की शुरुआत की और अपनी खोजपरक शैली के लिए जाने गए। तेवर की पत्रकारिता के लिए जाने जाते थे। संपादकाचार्य विद्याभास्कर, लक्ष्मीशंकर व्यास, चंद्रकुमार, कृपाशंकर शुक्ल आदि के सानिध्य में ‘आज’ अखबार में पत्रकारिता की शुरुआत करनेवाले गोपेश पांडेय आजीवन उसी संस्थान से जुड़े रहे। आजादी के दौर के ‘आज‘ अखबार के सम्पादक और पत्रकारिता में सम्पादकाचार्य के माने जानेवाले बाबूराव विष्णुराव पराड़करजी उनके आदर्श थे। वाराणसी में पत्रकारिता के दौरान कई अवसर ऐसे आए जब उनकी लेखनी शहर की बुलंद आवाज बनकर उभरी और इंसाफ का मार्ग प्रशस्त हुआ। निष्पक्ष और सरोकार की पत्रकारिता ने उन्हें अलग प्रसिद्धि दी। वाराणसी के अलावा वह लखनऊ में भी रहकर ‘आज‘ से जुड़े रहे और रिटायर होने के बाद काशी आ गये। अचानक उनका आध्यात्म की ओर झुकाव हो गया और वह काशी के मंदिरों में नियमित अपनी आस्था व्यक्त करने जाते रहे। सत्ता और शासन में अपनी हनक रखनेवाले गोपेशजी की सादगी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि नवाबगंज से पैदल परिवार के किसी सदस्य ने मोटरसाइकिल से  पहुंचा दिया तो अस्सी चौराहे आ जाते थे। वहीं जयनारायन मिश्र उर्फ जयनारायन गुरू, मुन्नूजी उनके हमराह हो जाते थे। चाय की चुस्कियां और करीबियों से मुलाकात के बाद घर वापसी। काशी पत्रकार संघ के आयोजनों में जरूर शामिल होते रहे। पुराने मित्रों और सहयोगियों के साथ एक कोने में बैठकर बातें करते। हमलोगों ने देखा तो प्रणाम किया, हल्की सी हंसी के बाद कैसे हो। इसके बाद वह अपनी दुनिया में ही मगन रहते थे। 

मुझे याद है आयोध्या में कारसेवा के दौरान मुलायम सिंह यादव की सरकार में 1990 में कारसेवकों पर गोली चलली थी। उस समय मीडिया में खबरें चलने लगी थी ‘सरयू का रंग कारसेवकों के खून से लाल हो गया‘, अनगिनत कारसेवकों के मारे जाने की खबरें चलने लगी थी। कोई सही आकंड़ा नही दे रहा था। तब आम जनमानस में मजबूत पकड़ रखनेवाला ‘आज‘ अखबार भी सशक्त भूमिका में था। अचानक रातों रात अखबार के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। रात में प्रशासनिक अफसर ‘आज‘ के कार्यालय धमक पड़े। प्रकाशन पूरा नही हो सका। अघोषित इमरजेंसी जैसे हालत थे। लेकिन तब भी प़त्रकारों ने अखबार की खबरो का फोटोस्टेट वितरित कराया था। पत्रकारिता का वह ‘संक्रमणकाल‘ बीत चुका था। वर्ष 1991 में कल्याण सिंह की सरकार बनी। 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहा दी गई और कल्याण सिंह की सरकार बर्खास्त कर दी गई। फिर 1993 में मुलायम सिंह की फिर सरकार बनी। चूंकि कारसेवकों पर गोली चलाये जाने की घटना के बाद अखबारों के प्रकाशन पर प्रतिबंध जैसे हालात से पत्रकार समाज नाराज था। सरकार मुलायम सिंह की थी।

इसी दौर  में मुलायम सिंह यादव के वाराणसी आने का कार्यक्रम घोषित हुआ। तब मैं एक सांध्यकालीन समाचार पत्र से जुड़ा रहा। मुलायम सिंह यादव और मंडल-कमंडल को जार था। मुलायम सिंह ने उसी दौर में हल्ला बोल आंदोलन का एलान कर दिया था। मुलायम सिंह वाराणसी पहुंचे। नगर निगम प्रेक्षागृह (अब रूद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर) में उनकी प्रेसवार्ता थी। मुलायम सिंह के आते ही कार्यकर्ता पूरे जोश में ‘बोल मुलायम हल्ला बोल‘ के नारे बुलंद कर रहे थे। गजब की गमहमागहमी थी और प्रेसवार्ता कक्ष खचाखच भरा था। हमलोग चारो तरफ फैलकर बैठे थे। गोपेशजी भी किसी सहयोगी को भेजने की वजाय खुद प्रेसवार्ता में पहुंचे थे। मुलायम सिंह ने सरकार की योजनाएं और उपलब्धियां गिनाईं। पत्रकारों के सवालों की बारी आई और मुलायम सिंह जवाब दे रहे थे। तभी अचानक गोपेश पांडेय की आवाज गूंजी। कहाकि मुलायम सिंहजी, क्या आपकी पिछली सरकार में अखबारों पर प्रतिबंध लगाया गया था? चूंकि अखबारों खासकर ‘आज‘ पर प्रतिबंध लिखित सरकारी आदेश के तहत नही था। इसलिए मुलायम सिंह ने कहा-नही कोई प्रतिबंध नही लगाया गया था। तब गोपेशजी ने खड़े होकर कहना शुरू किया। बोले प्रतिबंध लगा था हमलोगों ने वह स्थिति झेली थी। यदि सरकार ने प्रतिबंध नही लगाया था तो यह मान लिया जाय की आपके समय का प्रशासन मनमाने ढंग से चल रहा था।  साथ ही कहा-देखिए, सच स्वीकार कर लिजिए। उस घटना का हम पत्रकारों को मलाल है।

यदि स्थिति आज स्पष्ट हो जायेगी तो शायद मलाल दूर हो जाय, नहीं तो यह मलाल आगे भी बना रहेगा। तब एक मजे हुए राजनेता के रूप में मुलायम सिंह ने यही कहा-आपलोगों ने मेरी सरकार ले ली, अब क्या चाहते हो। इतना सुनते ही पत्रकारों का मलाल दूर हो गया। मुलायम सिंह गोपेश पांडेय को व्यक्तिगत रूप से जानते थे। सालों बात गोपेशजी लखनऊ आज अखबार के संस्करण में कार्यरत थे। उसी दौरान वह दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गये। मुलायम सिंह को पता चला तो उन्होंने तत्काल अपनी मशीनरी को लगाया। आनन-फानन में उनको भर्ती कराकर इलाज कराया गया। लेकिन गोपेशजी ने आजीवन सत्ता से कोई लाभ नही लिया। लेने की कोशिश भी नही की। मरते दम तक पैंट-शर्ट और वही हवाई चप्पल पहने नवाबगंज से अस्सी के बीच दिखाई दे देते रहे। 

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