यूपी पुलिस की मनमानी पर रोक! अब बिना कारण बताए नहीं होगी गिरफ्तारी, हाईकोर्ट में सरकार ने पेश किया 'नया अरेस्ट मेमो'
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद यूपी सरकार का बड़ा फैसला; गिरफ्तारी के समय साक्ष्य देना होगा अनिवार्य, जानें क्या बदल गया है नियम।
प्रयागराज (भदैनी मिरर डेस्क):
उत्तर प्रदेश में अब पुलिस की कार्यप्रणाली में एक बड़ा और पारदर्शी बदलाव होने जा रहा है। अब किसी भी व्यक्ति को बिना कारण बताए या बिना ठोस आधार के गिरफ्तार नहीं किया जा सकेगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष उत्तर प्रदेश सरकार ने यह महत्वपूर्ण आश्वासन दिया है कि राज्य में गिरफ्तारी की प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और नए कानूनों के अनुरूप सख्ती से लागू किया जाएगा।


नया 'गिरफ्तारी मेमो' हुआ तैयार
राज्य सरकार ने अदालत को सूचित किया है कि पुलिस महानिदेशक कार्यालय की ओर से इस संबंध में एक विस्तृत सर्कुलर जारी कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश पुलिस ने अब एक नया 'गिरफ्तारी मेमो' (Arrest Memo) तैयार किया है, जिसमें एकरूपता लाने के लिए देश की तमाम बड़ी एजेंसियों के मेमो का अध्ययन किया गया है। इसे इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता परितोष कुमार मालवीय के सुझावों और कानूनी बारीकियों को ध्यान में रखकर बनाया गया है।

इन 5 बिंदुओं का पालन होगा अनिवार्य
नए सर्कुलर के अनुसार, गिरफ्तारी के समय अब पुलिस को निम्नलिखित प्रक्रियाओं का पालन करना होगा:
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कारण बताना अनिवार्य: व्यक्ति को यह बताना होगा कि उसे किस आधार पर पकड़ा जा रहा है।
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साक्ष्यों की प्रस्तुति: केवल आरोप नहीं, बल्कि गिरफ्तारी का आधार स्पष्ट करने के लिए कुछ साक्ष्य भी दिखाने होंगे।
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कानूनी प्रावधान: यह प्रक्रिया 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' की धारा 35(1)(बी)(2) पर आधारित होगी।
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द्विभाषी मेमो: अब गिरफ्तारी मेमो हिंदी और अंग्रेजी, दोनों भाषाओं में उपलब्ध होगा ताकि गिरफ्तार व्यक्ति उसे आसानी से समझ सके।
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एकरूपता: पूरे प्रदेश में एक ही तरह के मेमो का इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि पुलिसिया कार्रवाई में कोई खामी न रहे।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद जागा तंत्र
गौरतलब है कि 'आशीष कक्कड़ बनाम चंडीगढ़ (2025)' के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे पुराने मेमो को अवैध बताया था। अदालत ने कहा था कि गिरफ्तारी मेमो कानून के प्रावधानों के अनुरूप होने चाहिए। इसी के मद्देनजर उत्तर प्रदेश के गृह विभाग ने व्यवस्थागत सुधार करते हुए यह नया ढांचा तैयार किया है।

सिस्टम की कमियों पर हाईकोर्ट तल्ख
एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अरुण कुमार देशवाल ने जिला न्यायालयों में लंबित मामलों और 'तारीख पर तारीख' की स्थिति पर चिंता जताई। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्याय में देरी के लिए केवल न्यायिक अधिकारी जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि पुलिस तंत्र, स्टाफ की कमी और फॉरेंसिक रिपोर्ट में होने वाली देरी भी मुख्य कारण हैं। कोर्ट ने सरकार को इन बुनियादी ढांचों में सुधार के कड़े निर्देश दिए हैं।
