शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने दुखी मन से माघ मेला क्षेत्र छोड़ा, लौट चले महादेव की नगरी काशी
कहा-एकजुट हों सनातनी, असली और नकली हिंदू का फर्क समझें
हमने अन्याय को अस्वीकार किया है और न्याय की प्रतीक्षा करेंगे
प्रयागराज। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने माघ मेला छोड़ने का एलान कर दिया और दुखी मन से श्रीकाशी विश्वनाथ की नगरी काशी के लिए रवाना हो गये। कहा कि उन्होंने कभी ऐसी कल्पना भी नहीं की थी। यहां उनके पहचान पर प्रश्न चिह्न खड़ा करने का प्रयास किया गया। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती माघ मेला में मौनी अमावस्या पर स्नान किये बगैर लौट गये थे। प्रशासनिक अधिकारियों ने फोर्स के साथ उन्हें पालकी से संगम जाने से रोक दिया था। इस दौरान नोकझोंक हुई और उनके अनुयायियों की पिटाई का भी आरोप है। इस पर उन्होंने प्रशासन द्वारा रोके जाने और संतों के अपमान का आरोप लगाते हुए कहा कि सनातनी लोगों पर हमला हो रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी सकारात्मक निर्णय न लेने का आरोप लगाते हुए सनातनियों से एकजुट होकर ’असली और नकली हिंदू’ का फर्क समझने का आह्वान किया। यह पहला मौका है जब माघ मेले में आने के बाद शंकराचार्य बिना स्नान ही वापस चले गए हैं।


मेला क्षेत्र छोड़ने से पहले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पत्रकारों से बातचीत की। कहाकि इस समय सनातनी लोगों पर हमला हो रहा है। उनके अधिकार और संस्कार खत्म करने का षड्यंत्र रचा जा रहा और प्राचीन मंदिरों को तोड़ा जा रहा है। कहाकि मौनी अमावस्या पर मैं स्नान नहीं कर पाया। संतों और बटुकों को पीटने के साथ मेरा अपमान किया गया। कष्टकारी यह है कि इस मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कोई सकारात्मक निर्णय नहीं लिया। उन्हें जितना दुःख इस बार हुआ है, उतना कभी नहीं हुआ। वह अपने सम्मान की लड़ाई लड़ते रहेंगे। कहाकि अभी समय है जब सनातन धर्म के लोग एकजुट हो जांय और असली-नकली हिंदू के फर्क को समझें। उन्होंने कहा कि वह आस्था और श्रद्धा के साथ माघ मेला में आए थे, लेकिन परिस्थितियां ऐसी बन गईं कि बिना स्नान किए ही लौटना पड़ रहा है। प्रयागराज हमेशा से शांति, विश्वास और सनातन परंपराओं की भूमि रही है और यहां से इस तरह लौटना उनके लिए बेहद पीड़ादायक है। मौनी अमावस्या पर ऐसी घटना घटी, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी। माघ मेला में स्नान करना उनके लिए केवल एक धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि आस्था का विषय था। इसके बावजूद उन्हें दुखी मन से मेला क्षेत्र छोड़ने का कठिन निर्णय लेना पड़ा। हमने अन्याय को अस्वीकार किया है और न्याय की प्रतीक्षा करेंगे। प्रयागराज की धरती पर जो कुछ घटित हुआ उसने हमारी आत्मा को झकझोर दिया है। आज हम यहां से जा रहे हैं, लेकिन अपने पीछे सत्य की गूंज छोड़कर जा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि कल शाम और प्रातः काल प्रशासन की ओर से हमारे मुख्य कार्यधिकारी को एक प्रस्ताव भेजा गया था। कहा गया कि आप जब जाना चाहेंगे हम आपको ससम्मान स्नान कराने के लिए तैयार हैं। सभी अधिकारी मौजूद रहकर पुष्पवर्षा करेंगे, लेकिन इसमें उस दिन की घटना के लिए क्षमा याचना नहीं की गई थी। हमें लगा यदि हम स्नान कर लेंगे और पुष्प वर्षा करवा लेंगे तो उस दिन की बात अधूरी रह जाएगी। ज्योतिर्मठ के पीठाधीश्वर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि जो असली मुद्दा है और जिसके लिए हम दस दिन तक फुटपाथ पर बैठे रहे। इतना लंबा समय दिया, लेकिन ग्यारह दिन बीत जाने के बाद जब जाने का निर्णय लिया। अब प्रशासन की ओर से प्रस्ताव आया। इसलिए हमने स्वीकार नहीं किया। शंकराचार्य ने कहा जो मुगलों के समय में हुआ वही आज हो रहा है। एक तरफ गृहमंत्री का बयान आया है कि संतों का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वहीं माघ मेले में संतों को उनकी चोटी और शिखा पकड़कर घसीटा गया और पीटा गया। आज यहां जो अपमान हुआ वह सरकार का दोहरा चरित्र उजागर करता है।

शंकराचार्य ने दो मिनट का मौन रखकर संतों का अपमान करने वालों को दंड मिले ऐसी भगवान से प्रार्थना की। कहाकि संगम तट पर हमारी भौतिक हत्या का प्रयास किया गया। इन दिनों हमारी पीठ की हत्या का प्रयास हुआ वो सफल रहा। यह हत्या अगर यहां का प्रशासन कर रहा होता तो ठीक है, लेकिन इसके पीछे यूपी की सरकार का हाथ है। पत्रकारों को संबोधित करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि प्रयागराज की पवित्र धरती पर हम आध्यात्मिक शांति की कामना लेकर आते हैं, लेकिन आज यहां से एक ऐसी रिक्तता और भारी मन लेकर लौटना पड़ रहा है। हम बिना स्नान किए, इस संकल्प को अधूरा छोड़कर यहां से विदा ले रहे हैं। जब हृदय में क्षोभ और ग्लानि का ज्वार हो, तो जल की शीतलता भी अर्थहीन हो जाती है।
