Movie prime
PMC_Hospital

हुक्का बार चलाना कोई मौलिक अधिकार नहीं: हाईकोर्ट का फैसला, कहा— 'जनहित में सरकार लगा सकती है पूरी तरह रोक'

हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने हुक्का बार मालिकों की याचिकाएं कीं खारिज, शराब और जुए की श्रेणी में रखा; सख्त नियम बनाने के अधिकार को ठहराया सही.

Ad

 
Supreme Court
WhatsApp Group Join Now

Ad

लखनऊ (भदैनी मिरर): इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने हुक्का बारों के संचालन को लेकर एक बेहद बड़ा और दूरगामी फैसला सुनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि हुक्का बार चलाना संविधान के तहत कोई मौलिक अधिकार (Fundamental Right) नहीं है. अदालत ने जनहित और आम जनता के स्वास्थ्य की सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हुए इस पर प्रतिबंध लगाने या सख्त नियम लागू करने के राज्य सरकार के अधिकार को पूरी तरह से सही ठहराया है.

Ad
Ad

यह महत्वपूर्ण आदेश जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने बुधवार को विभिन्न हुक्का बार संचालकों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जारी किया.

कोर्ट ने खारिज की कारोबार के 'मौलिक अधिकार' की दलील

दरअसल, उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में प्रशासन द्वारा हुक्का बारों के खिलाफ की गई दंडात्मक कार्रवाई, उन्हें बंद कराने और नया व्यापारिक लाइसेंस जारी करने से इनकार करने के खिलाफ कई ऑपरेटरों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि हुक्का बार चलाना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यापार और व्यवसाय करने के उनके मौलिक अधिकार के दायरे में आता है.

Ad

हाईकोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह सिरे से खारिज कर दिया. पीठ ने साफ कहा कि व्यापार करने के अधिकार का मतलब यह नहीं है कि समाज के स्वास्थ्य को खतरे में डालकर कोई भी व्यवसाय करने की छूट दे दी जाए.

शराब और जुए की श्रेणी में माना गया हुक्का बार

अदालत ने अपने आदेश में तंबाकू और निकोटीन के दुष्प्रभावों का जिक्र करते हुए कड़ा रुख अपनाया. कोर्ट ने कहा:

Ad

"हुक्का बार में बड़े पैमाने पर तंबाकू और निकोटीन का सेवन कराया जाता है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य और लोगों की सेहत के लिए एक गंभीर खतरा है. इसलिए, शराब और जुए (Gambling) की तरह ही हुक्का बार को भी पूरी तरह से सुरक्षित ट्रेड और बिजनेस अधिकारों के दायरे से बाहर रखा जा सकता है."

अदालत ने आगे जोड़ा कि राज्य सरकार के पास नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करने की संवैधानिक जिम्मेदारी है, और इस उद्देश्य के लिए वह ऐसी नुकसानदेह गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए स्वतंत्र है.

कोरोना काल के प्रतिबंधों का भी दिया हवाला

फैसला सुनाते समय खंडपीठ ने न्यायपालिका के पुराने आदेशों का भी विशेष रूप से उल्लेख किया. कोर्ट ने याद दिलाया कि जब देश में कोविड-19 (Covid-19) महामारी का प्रकोप फैला हुआ था, तब संक्रमण के तेजी से फैलने के बड़े खतरे को देखते हुए हाईकोर्ट ने ही पूरे उत्तर प्रदेश में हुक्का बारों के संचालन पर पूरी तरह रोक लगा दी थी. वह फैसला भी सार्वजनिक सुरक्षा के हित में था और आज का फैसला भी इसी दिशा में एक कदम है.