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कैश स्कैंडल की जांच के बीच जस्टिस यशवंत वर्मा ने ली इलाहाबाद हाईकोर्ट में ली शपथ, बार एसोसिएशन ने जताया विरोध

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yashwant verma
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नई दिल्ली/प्रयागराज : दिल्ली हाईकोर्ट से स्थानांतरित किए गए जस्टिस यशवंत वर्मा ने शनिवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट में पद एवं गोपनीयता की शपथ ग्रहण की। हालांकि, वर्तमान में वे किसी भी न्यायिक कार्य से दूर रखे गए हैं क्योंकि उनके खिलाफ एक संवेदनशील जांच प्रक्रिया जारी है। शपथ ग्रहण समारोह मुख्य न्यायाधीश के चैंबर में निजी तौर पर संपन्न हुआ, जो सामान्य सार्वजनिक समारोहों से हटकर था।

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शपथ लेने के साथ ही हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर न्यायाधीशों की वरिष्ठता सूची में उनका नाम शामिल कर लिया गया है। वे सूची में आठवें स्थान पर हैं। बताया गया है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश की अनुमति से ही जस्टिस वर्मा ने चैंबर में शपथ ली।

बार एसोसिएशन ने जताई कड़ी आपत्ति

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इस घटनाक्रम से इलाहाबाद हाईकोर्ट की बार एसोसिएशन असहज दिखी। एसोसिएशन के सचिव विक्रांत पांडेय द्वारा चीफ जस्टिस को लिखे गए पत्र में कहा गया है कि न तो बार को और न ही अधिकतर न्यायाधीशों को इस शपथ ग्रहण की जानकारी दी गई थी। इसे पारदर्शिता और परंपराओं के खिलाफ बताया गया है।

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एसोसिएशन ने इस तरह के गुप्त तरीके से किए गए शपथ समारोह की आलोचना करते हुए मांग की है कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक जस्टिस वर्मा को कोई न्यायिक अथवा प्रशासनिक कार्य न सौंपा जाए। यह पत्र प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, कानून मंत्री, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और लखनऊ बेंच के सभी जजों को भी भेजा गया है।

कैश कांड से जुड़ा है मामला

14 मार्च को जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित आवास में आग लगने की घटना सामने आई थी। दमकल कर्मियों को आग बुझाते समय उनके स्टोर रूम में बड़ी मात्रा में जले हुए नकदी नोट मिले थे, जिसकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थीं। उस समय जस्टिस वर्मा भोपाल में थे और अगले दिन दिल्ली लौटे थे।

स्थानांतरण और हड़ताल का दौर

घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दिल्ली से इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थानांतरित कर दिया। उनके ट्रांसफर के विरोध में इलाहाबाद बार एसोसिएशन ने हड़ताल की घोषणा की थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और केंद्रीय कानून मंत्री से बातचीत के बाद बार ने आम लोगों के हित में हड़ताल वापस ले ली थी।

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शपथ को रोकने की याचिका दाखिल

इस पूरे घटनाक्रम के बीच लखनऊ बेंच में 2 अप्रैल को वकील विकास चतुर्वेदी की ओर से एक जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें शपथ को रोकने की मांग की गई। याचिकाकर्ता के वकील अशोक पांडेय ने तर्क दिया कि जब तक कैश मामले की जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक उन्हें जज के रूप में नियुक्त करना उचित नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार के उस नोटिफिकेशन को भी चुनौती दी है, जिसमें उनके ट्रांसफर को स्वीकृति दी गई थी।

फिलहाल यह जनहित याचिका सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हुई है। अब सबकी नजरें कोर्ट के आगामी निर्णय और जांच की प्रगति पर टिकी हैं।

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