इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: तलाकशुदा महिला की मौत के बाद कौन होगा संपत्ति का वारिस? जानें मां के अधिकार पर कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट ने कहा- तलाक की डिक्री के बाद पति का कानूनी दर्जा खत्म, संपत्ति पर कोई हक नहीं
प्रयागराज (भदैनी मिरर): इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की बारीकियों को स्पष्ट करते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की पीठ ने निर्धारित किया है कि यदि पति-पत्नी के बीच आपसी सहमति से तलाक (Section 13-B) हो चुका है और समझौते की राशि प्राप्त करने से पहले पत्नी की मृत्यु हो जाती है, तो उसकी मां उस धन को प्राप्त करने की असली हकदार होगी।


क्या है पूरा मामला?
यह मामला बांदा जनपद की किरन रायकवार (मृतक) से जुड़ा है। पति-पत्नी ने आपसी सहमति से तलाक लिया था, जिसके तहत पति को कुल 20 लाख रुपये समझौते के तौर पर देने थे। इसमें से 4 लाख का भुगतान हो चुका था, लेकिन शेष 16 लाख रुपये का चेक मिलने से ठीक पहले किरन की मृत्यु हो गई। किरन की मां ने इस राशि पर अपना दावा पेश करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

कोर्ट ने की कानून की व्याख्या
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धाराओं का विश्लेषण करते हुए कई महत्वपूर्ण बातें कहीं:
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पूर्ण संपत्ति का अधिकार (धारा 14): कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी हिंदू महिला को गुजारा भत्ते या डिक्री के माध्यम से जो भी संपत्ति मिलती है, वह उसकी ‘पूर्ण संपत्ति’ (Absolute Property) मानी जाती है, न कि सीमित।
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पति का हक क्यों नहीं? (धारा 15): सामान्यतः महिला की मृत्यु के बाद संपत्ति संतान या पति को जाती है। लेकिन इस मामले में तलाक की डिक्री पहले ही पारित हो चुकी थी, जिससे पति का कानूनी दर्जा समाप्त हो गया था।
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माता-पिता का अधिकार: चूंकि दंपति की कोई संतान नहीं थी और पति अब उत्तराधिकारी नहीं रहा, इसलिए कानूनन यह अधिकार मृतका के माता-पिता के पास चला जाता है।
कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: हाईकोर्ट ने मृत पति की उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि यह पैसा केवल पत्नी के जीवित रहने तक उसके भरण-पोषण के लिए था। अदालत ने साफ किया कि फैमिली कोर्ट में जमा धन मृतका की 'संपदा' (Estate) का हिस्सा है और इसे कानूनी वारिस को देना ही होगा।
फैमिली कोर्ट को आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 146 का हवाला देते हुए मृतका की मां को कानूनी प्रतिनिधि माना। कोर्ट ने प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट बांदा को सख्त निर्देश दिया है कि दो सप्ताह के भीतर 16 लाख रुपये की राशि याचिकाकर्ता (मां) को जारी की जाए।

