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यूपी पंचायत चुनाव पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने के सरकारी आदेश पर लगाई रोक

हाईकोर्ट ने सरकार के फैसले को बताया असंवैधानिक; कहा— 5 साल से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता कार्यकाल, चुनाव टलने से यूपी के 57 हजार गांवों में प्रशासनिक असमंजस

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भदैनी मिरर, प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों (UP Panchayat Chunav) को लेकर एक बहुत बड़ा विधिक मोड़ सामने आया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश के ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्हें ही बतौर 'प्रशासक' नियुक्त करने के राज्य सरकार के फैसले पर कड़ी तल्खी दिखाते हुए रोक लगा दी है। हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में सरकार के इस कदम को असंवैधानिक करार दिया है और कहा है कि किसी भी परिस्थिति में ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में पद पर बने रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसके साथ ही अदालत ने राज्य में पंचायत चुनाव टालने को लेकर भी सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

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संविधान के विपरीत हैं सरकार के आदेश: हाईकोर्ट

याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने प्रदेश में पंचायत चुनाव टालने और प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाने पर गहरा असंतोष व्यक्त किया। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 243ई का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष के लिए निश्चित है। किसी भी हाल में यह 5 साल की अवधि समाप्त होने से पहले अगले चुनाव संपन्न करा लिए जाने चाहिए। राज्य सरकार कोई भी अध्यादेश या नया कानून लाकर चुनावों को 5 साल से आगे नहीं खींच सकती। अदालत ने कहा कि सरकार द्वारा जारी किए गए दोनों आदेश पूरी तरह से संविधान की मूल भावना के विपरीत हैं।

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2000 के 'प्रेम लाल पटेल' केस का दिया गया हवाला

यह महत्वपूर्ण आदेश अरविंद राठौर की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। याचिका में राज्य सरकार द्वारा गत 25 व 26 मई को जारी उन आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत 'यूपी पंचायत राज अधिनियम 1947' की धारा 12(3-ए) के आधार पर चुनाव टाल दिए गए थे और प्रधानों को प्रशासक के रूप में कार्य जारी रखने की अनुमति दी गई थी।

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सुनवाई के दौरान कोर्ट को अवगत कराया गया कि वर्ष 2000 में ही 'प्रेम लाल पटेल बनाम राज्य सरकार' के मामले में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच इस धारा को संविधान के अनुच्छेद 243ई और 243के का खुला उल्लंघन मानते हुए पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुकी है। ऐसे में सरकार ने दोबारा इसी असंवैधानिक कानून के तहत आदेश कैसे जारी कर दिया?

57 हजार से अधिक गांवों में खड़ा हुआ प्रशासनिक संकट

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के 57 हजार से अधिक गांवों के ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बीते 26 मई 2026 को समाप्त हो चुका है। कार्यकाल समाप्त होते ही सरकार ने चुनावों में हो रही देरी को देखते हुए प्रधानों को ही प्रशासक की जिम्मेदारी सौंप दी थी। लेकिन अब हाईकोर्ट द्वारा इस फैसले को असंवैधानिक बताते हुए रोक लगाने के बाद, उत्तर प्रदेश की ग्राम पंचायतों के प्रशासनिक और विकास कार्यों के संचालन को लेकर एक बड़ा असमंजस और संकट खड़ा हो गया है।

ओबीसी (OBC) आयोग के गठन के कारण टले हैं चुनाव

पंचाचत चुनावों में हो रही इस देरी के पीछे की मुख्य वजह सरकार द्वारा हाल ही में 'ओबीसी आयोग' के गठन को दी गई मंजूरी है। यह आयोग प्रदेश के सभी जिलों का दौरा कर पिछड़े वर्गों की वास्तविक आबादी और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति का डेटा जुटाएगा। इस आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही आगामी ग्राम पंचायतों में पिछड़ों के लिए आरक्षण (Reservation) की सीमा तय की जाएगी। इसी प्रक्रियात्मक कार्य के चलते उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो सके और इनमें देरी हो रही है।