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FIR की भाषा पर इलाहाबाद हाईकोर्ट: यूपी के गृह सचिव और DGP को निर्देश- 'पब्लिक डॉक्यूमेंट में न हों गाली-गलौज वाले शब्द

बिना सबूत चार्जशीट पर भी उठाए सवाल

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Allahabad High Court
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प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली और एफआईआर (FIR) की भाषा को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि एफआईआर एक पब्लिक डॉक्यूमेंट (सार्वजनिक दस्तावेज) होता है, इसलिए इसकी भाषा ऐसी होनी चाहिए जो आम आदमी के पढ़ने लायक हो और जिससे सभ्य समाज की छवि धूमिल न हो।

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जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की एकलपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए प्रदेश के गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) को तत्काल प्रभाव से एक शासनादेश या सर्कुलर जारी करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि सभी पुलिस थानों को यह हिदायत दी जाए कि एफआईआर दर्ज करते समय उसमें किसी भी तरह के असभ्य शब्दों या गाली-गलौज को शामिल न किया जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने मारपीट के एक आरोपी की जमानत अर्जी को खारिज कर दिया।

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बिना सबूत चार्जशीट दाखिल करने पर हाईकोर्ट की गंभीर टिप्पणी

एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस द्वारा बिना पुख्ता सबूतों के चार्जशीट दाखिल करने और निचली अदालतों द्वारा यांत्रिक (Mechanical) तरीके से उस पर संज्ञान लेने पर कड़ी नाराजगी जताई।

  • क्या था मामला: याचिकाकर्ता पर आरोप लगाया गया था कि उसने शिकायतकर्ता के रिश्तेदारों को आपत्तिजनक पत्र लिखे, जिससे एक शादी टूटने की नौबत आ गई और शादी में बाधा उत्पन्न हुई।

  • पुलिस की लापरवाही: सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि पुलिस ने ऐसा कोई भी आपत्तिजनक पत्र बरामद नहीं किया और न ही कोई ठोस सबूत जुटाया। इसके बावजूद पुलिस ने कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी।

  • निचली अदालत का रुख: निचली अदालत ने भी बिना किसी ठोस आधार या वाद कारण (Cause of Action) के इस पर संज्ञान लेते हुए आरोपी को समन जारी कर दिया।

माननीय न्यायालय की टिप्पणी: "बिना किसी ठोस साक्ष्य के, केवल बयानों के आधार पर झूठी एफआईआर दर्ज कर आपराधिक केस चला दिया गया। अदालत द्वारा बिना सबूतों को परखे इस तरह यांत्रिक रूप से संज्ञान लेना और समन जारी करना न्यायसंगत नहीं है।"

पुलिस और न्यायिक व्यवस्था के लिए बड़ा संदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह रुख उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था और पुलिसिंग के लिहाज से काफी बड़ा माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, अक्सर थानों में दर्ज होने वाली एफआईआर में पीड़ित या आरोपी के बयानों को हुबहू बेहद आपत्तिजनक और अश्लील शब्दों के साथ लिख दिया जाता है। चूंकि एफआईआर ऑनलाइन पोर्टल पर भी उपलब्ध होती है, इसलिए कोर्ट ने इसकी भाषा को मर्यादित और सभ्य रखने पर जोर दिया है।

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साथ ही, बिना साक्ष्य के चार्जशीट दाखिल करने पर कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद अब पुलिस अधिकारियों को विवेचना (Investigation) के दौरान वैज्ञानिक और दस्तावेजी सबूत जुटाने पर अधिक ध्यान देना होगा।