तथ्य छिपाकर बैंक खाता चालू कराने की कोशिश पड़ी भारी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाया ₹1 लाख का भारी जुर्माना
प्रबंधन विवाद छिपाकर डिग्री कॉलेज के बैंक खाते खोलने की मांग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त; याचिका खारिज कर लगाया 1 लाख का जुर्माना।
प्रयागराज: अदालत में महत्वपूर्ण तथ्य छिपाकर राहत पाने की कोशिश करने वाले पक्षकारों को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा संदेश दिया है। एक डिग्री कॉलेज के बैंक खातों के संचालन (De-freeze) की अनुमति मांगने वाली याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पर ₹1 लाख का भारी जुर्माना (Exemplary Cost) लगाया है।


जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अब्देश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि याचिकाकर्ता ने कॉलेज का संचालन करने वाली सोसाइटी के वर्षों पुराने प्रबंधन विवाद और उससे जुड़ी पिछली कानूनी कार्यवाहियों के मुख्य तथ्यों को जानबूझकर छिपाया था।
क्या था पूरा मामला?

यह याचिका अबीदा बानो नाम की महिला ने दाखिल की थी, जिन्होंने खुद को हरदोई स्थित 'मसीहुननिसा डिग्री कॉलेज' का मैनेजर बताया था। याचिका में मांग की गई थी कि साल 2020 से फ्रीज पड़े कॉलेज के बैंक खातों को चालू कराया जाए और उन्हें खातों के संचालन के लिए अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता (Authorized Signatory) माना जाए।


हालांकि, सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि ये खाते 2020 से क्यों बंद थे, इसका कोई स्पष्ट कारण याचिका में नहीं दर्शाया गया था।
प्रबंधन विवाद को छिपाने का प्रयास
कोर्ट के संज्ञान में आया कि यह मामला 'किशन शिक्षा संस्थान' के प्रबंधन से जुड़े एक जटिल और पुराने विवाद से जुड़ा है। 2020 में संस्थापक मैनेजर की मृत्यु के बाद दो अलग-अलग गुटों ने सोसाइटी पर अपना दावा ठोक दिया था।
इसके बाद सोसाइटी के नवीनीकरण, चुनाव और कार्यकारिणी समिति को लेकर कई न्यायिक कार्यवाहियां भी हुईं। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता इन सभी विवादों और कानूनी लड़ाइयों से अच्छी तरह वाकिफ थीं, इसके बावजूद उन्होंने इसे एक सामान्य बैंक खाता डी-फ्रीज कराने का मामला बनाकर पेश करने की कोशिश की।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी:
-
'साफ हाथों से आएं कोर्ट': पीठ ने स्पष्ट कहा कि संविधान के तहत रिट अधिकार क्षेत्र (Writ Jurisdiction) का सहारा लेने वाले हर पक्षकार को "साफ हाथों" (Clean Hands) के साथ अदालत के सामने आना चाहिए।
-
अदालत के साथ धोखाधड़ी: तथ्यों को जानबूझकर छिपाना केवल एक प्रक्रियात्मक चूक (Procedural Lapse) नहीं है, बल्कि यह "अदालत के साथ धोखाधड़ी" (Playing Fraud Upon the Court) की श्रेणी में आता है।
-
कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग: कोर्ट ने इस याचिका को "कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग" (Gross Abuse of the Process of Law) करार दिया।
1 महीने में जुर्माना जमा करने का आदेश
हाईकोर्ट ने याचिका को सिरे से खारिज करते हुए याचिकाकर्ता अबीदा बानो को आदेश दिया कि वह 1 लाख रुपये का जुर्माना उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, लखनऊ में एक महीने के भीतर जमा कराएं।
