Movie prime
PMC_Hospital

Ramnagar Ramlila Day 8: रामनगर रामलीला के 8वें दिन का प्रसंग, श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी

नारद-राम संवाद से हुई 8वें दिन की शुरुआत; दशरथ के वचन, मंथरा की कुटिल नीति और कौशल्या-सीता के भावुक संवाद ने रामलीला प्रेमियों की आंखें की नम।

Ad

 
df
WhatsApp Group Join Now

Ad

 

 

रामनगर, वाराणसी (भदैनी मिरर): काशी की विश्वप्रसिद्ध और ऐतिहासिक 'रामनगर रामलीला' के आठवें दिन की कथा में अध्यात्म, भ्रातृ-प्रेम, वचनों के पालन और वियोग के कारुणिक प्रसंगों का सजीव मंचन हुआ। लीला प्रेमियों और श्रद्धालुओं ने प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक की प्रसन्नता से लेकर उनके वनवास गमन तक के भावुक क्षणों का प्रत्यक्ष अनुभव किया।

Ad

नारद-राम संवाद से लीला का शुभारंभ

कथा की शुरुआत एक क्षेपक कथा के साथ हुई। देवर्षि नारद जी प्रभु श्री राम से मिलने अयोध्या पधारते हैं। श्रीराम बड़े ही आदर और प्रेम के साथ नारद जी के पाद्य प्रक्षालन (चरण धोना) करते हैं। नारद जी देवताओं की ओर से प्रभु को स्मरण कराते हैं कि अब लीला का समय आ गया है, जब उन्हें दुष्ट रावण का वध कर देवगणों को भयमुक्त करना है। इस पर प्रभु श्रीराम मुस्कुराते हुए कहते हैं कि वे इंद्रदेव से कहें कि उन्हें सब स्मरण है और वे देवताओं के ही कार्य में तत्पर हैं।

राज्याभिषेक की घोषणा और श्रीराम का अनुज प्रेम

तत्पश्चात कथा अयोध्या के राजमहल में पहुँचती है। महाराज दशरथ दर्पण में अपने श्वेत केश देखकर स्वयं को अवस्था के चौथेपन में पाते हैं और वरिष्ठों तथा गुरु वशिष्ठ की सहमति से श्रीराम को राजा बनाने का विचार प्रस्तुत करते हैं। सर्वत्र हर्ष की लहर दौड़ जाती है।

परंतु जब प्रभु श्री राम को गुरुदेव के माध्यम से ज्ञात होता है कि केवल उनका ही राज्याभिषेक हो रहा है, तो वे दुखी हो जाते हैं। प्रभु सोचते हैं कि—

"जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई॥" "बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू॥"

श्रीराम अपने निर्मल वंश में इसे अनुचित मानते हैं कि सभी भाइयों को छोड़कर केवल बड़े का ही राज्याभिषेक हो। प्रभु का यह निष्कपट अनुज-प्रेम भक्तों के हृदय को छू लेता है।

dc

देवताओं की अधीरता, मंथरा का कुचक्र और कैकेयी का कोपभवन

जब आकाश में श्रीराम के राजा बनने की चर्चा होती है, तो देवता लीला के बाधित होने के भय से अधीर हो उठते हैं। देवराज इंद्र की विनती पर देवी सरस्वती अयोध्या में दासी मंथरा की मति फेर देती हैं। मंथरा रानी कैकेयी को कुटिल नीतियाँ सिखाकर कोपभवन जाने के लिए उकसाती है।

कैकेयी के कोपभवन जाने का समाचार पाकर महाराज दशरथ व्याकुल होकर वहाँ पहुँचते हैं। जब महाराज श्रीराम की सौगंध लेते हैं, तो रानी कैकेयी अपने दो पुराने वरदान मांगती हैं—पहला भरत को अयोध्या का राज और दूसरा श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास। यह सुनते ही महाराज दशरथ बिन पानी की मछली की भांति तड़प उठते हैं।

g

माता कौशल्या और सिया जी का भावुक संवाद

अगली सुबह जब महाराज दरबार में नहीं आते, तो मंत्री सुमंत्र राम जी के पास पहुँचते हैं। प्रभु श्रीराम कोपभवन में पिता की दशा देखकर व्यथित होते हैं और माता कैकेयी से सारा वृत्तांत जानकर पिता के वचनों को निभाकर कुल की कीर्ति की रक्षा का संकल्प लेते हैं।

श्रीराम जब माता कौशल्या से आज्ञा लेने पहुँचते हैं और बताते हैं कि "पिताजी ने मुझे वन का राज्य दिया है", तो माता स्तब्ध रह जाती हैं। बाद में जब उन्हें सत्य का बोध होता है, तो वे रोते हुए भी धर्म का पालन करने का आशीर्वाद देती हैं। वनगमन का समाचार सुनते ही माता सीता जी भी व्याकुल होकर प्रभु श्रीराम के पास पहुँचती हैं और साथ वन चलने का हठ करती हैं।

इसी भावुक मोड़ पर आज के लीला प्रसंग को विश्राम दिया गया। कथा के अंत में माता कौशल्या जी द्वारा उतारी गई आरती देखकर श्रद्धालुओं के हृदय में एक गहरा शोक और भक्ति का भाव व्याप्त हो गया।