Ramnagar Ramlila Day 6: रामनगर रामलीला में मझा बारात का उल्लास, जनकपुर में गूंजे मंत्र और वैवाहिक मंगलगीत
पत्रिका वाचन से लेकर द्वारपूजा और कन्यादान तक—वैदिक विधि-विधान से संपन्न हुआ श्री सीताराम विवाह; आठों स्वरूपों की आरती देखने उमड़े श्रद्धालु
रामनगर (वाराणसी) / भदैनी मिरर: काशी की विश्वप्रसिद्ध रामनगर रामलीला के छठे दिन संपूर्ण रामनगर क्षेत्र अध्यात्म, भक्ति और वैवाहिक उल्लास के रंग में रंगा नजर आया। कोई घराती तो कोई बाराती बनकर प्रभु श्री राम के विवाह उत्सव में शामिल होने को उत्सुक दिखा। इस अलौकिक अवसर पर तुलसीदास जी की 'गीतावली' के अमर पदों— "राजति राम-जानकी-जोरी..." के सस्वर गायन और मंत्रोच्चार के बीच चारों भाइयों का विवाह वैदिक रीति-रिवाज के साथ संपन्न हुआ।

अयोध्या में गूंजी बधाई, जनकपुर से आई लगन पत्रिका
कथा का शुभारंभ अयोध्या धाम से हुआ, जहाँ राजा जनक के दूत (जिसका सजीव अभिनय व संवाद अदायगी वरिष्ठ पात्र 'बच्चन गुरुजी' ने की) महाराज दशरथ के दरबार में पत्रिका लेकर पहुंचते हैं। पत्रिका में धनुष भंग, परशुराम-लक्ष्मण संवाद और सीता स्वयंवर के साथ विवाह का पावन निमंत्रण अंकित होता है।

दूत के भावपूर्ण संवाद और चौपाइयों के वाचन से संपूर्ण लीला प्रेमी भावविभोर हो उठे। राजा दशरथ बार-बार उस पत्रिका को पढ़कर प्रफुल्लित होते हैं। जब दशरथ जी पूछते हैं कि जनक जी ने उनके बालकों को कैसे पहचाना, तो दूत उत्तर देता है कि जैसे सूर्य को ढूँढने के लिए दीपक की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही आपके तेजस्वी पुत्रों को देखते ही सब मोहित हो जाते हैं।

अयोध्या से निकली भव्य बारात, जनकपुर में हुआ स्वागत
लगन पत्रिका का वाचन गुरु वशिष्ठ, माताओं तथा भरत-शत्रुघ्न के समक्ष होने के बाद संपूर्ण अयोध्यावासी बारात के रूप में जनकपुर के लिए प्रस्थान करते हैं। पारंपरिक घोड़ों और रथों के साथ निकली बारात जब जनकपुर पहुंचती है, तो जनकवासियों द्वारा जनवासे में उनका भव्य स्वागत किया जाता है।
दूल्हे के वेश में चारों भाइयों (श्री राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न) के अनुपम स्वरूप को देखकर न केवल सखियां और नगरवासी मोहित हुए, बल्कि आकाश से देवता, ब्रह्मा, शिव जी और यक्ष गण भी इस झांकी को निहारने आ पहुंचे। तुलसीदास जी के शब्दों में— इंद्र को मिला हजार नेत्रों का शाप आज भगवान का दर्शन पाकर वरदान में बदल गया।
वैदिक रीति से द्वारपूजा, परछन और कन्यादान
"मंगल मूल लगन दिन आवा..." की चौपाई के साथ विवाह का शुभ मुहूर्त आता है।
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परछन व लोकगीत: द्वारपूजा के समय महारानी सुनैना द्वारा पारंपरिक मुसर-लोढ़ा से चारों भाइयों की परछन आरती की गई। लीला परिसर में उपस्थित माता-बहनों ने पारंपरिक अवधी व मैथिल विवाह गीत गाकर सनातन परंपरा को जीवंत कर दिया।
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पाणिग्रहण संस्कार: वशिष्ठ जी और शतानंद जी के सांनिध्य में पूरे मंत्रोच्चार और विधि-विधान से चारों भाइयों का विवाह संपन्न हुआ। राजा जनक ने अश्रुपूरित नेत्रों व भावपूर्ण हृदय से कन्यादान कर स्वयं को धन्य माना।
आठों स्वरूपों की महाआरती रही विशेष आकर्षण
विवाह संपन्न होने के उपरांत लीला स्थल पर एक साथ आठों दिव्य स्वरूप— श्री राम-जानकी, भरत-मांडवी, लक्ष्मण-उर्मिला और शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति सिंहासन पर विराजमान हुए। महारानी सुनैना जी द्वारा उतारी गई इस मनोरम महाआरती का दर्शन कर हज़ारों की संख्या में उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे और संपूर्ण परिसर "जय सियाराम" और "हर-हर महादेव" के जयकारों से गुंजायमान हो गया।



