"मेरे बदले राम जी को लौटा दो..."- भरत जी के अमर त्याग से छलकीं रामनगर के श्रद्धालुओं की आँखें
काशी के रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला में भरत जी के त्याग और भ्रातृ प्रेम की अमर मिसाल; माता सरस्वती ने इंद्र को सिखाया सबक, निषादराज जी ने की आरती।
भदैनी मिरर वाराणसी डेस्क: जगविख्यात रामनगर की रामलीला के तेरहवें दिन बुधवार को चित्रकूट में अयोध्या के राजपरिवार द्वारा स्थापित उच्च आदर्शों, त्याग और भ्रातृ प्रेम का ऐसा अलौकिक प्रसंग जीवंत हुआ, जिसे देखकर देवगण भी अचरज और दुविधा में पड़ गए।
लीला की शुरुआत गुरु वशिष्ठ और भरत जी की सभा से हुई। गुरु वशिष्ठ जी ने भरत जी से अपने मन की बात श्री राम के समक्ष रखने को कहा। गुरुदेव ने कहा कि 'प्रभु धर्म के स्वरूप हैं, वे मर्यादा नहीं छोड़ सकते और मेरी बुद्धि तुम्हारे भ्रातृ प्रेम के आगे कुंठित हो गई है।' इस पर भरत जी ने अत्यंत विनयपूर्वक कहा कि यह उनका दुर्भाग्य है कि गुरुदेव जैसा ज्ञानी उनसे उपाय पूछ रहा है।

"आपने खेल में भी मुझे कभी हारने नहीं दिया" — भरत जी का भावुक प्रस्ताव
जब सभी श्री राम के समीप पहुंचे, तो भरत जी ने हाथ जोड़कर प्रभु राम से कहा:
"हे प्रभु! आपने बचपन में खेल-खेल में भी मुझे कभी कटु वचन नहीं बोले। मेरा मन न टूटे, इसलिए आपने हमेशा स्वयं हारकर मुझे जिताया। परंतु आज मैं अपनी माता कैकेयी की करनी से हार गया हूँ। मैं राजतिलक की समस्त सामग्री लाया हूँ। आप, सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ अयोध्या लौट चलिए और हम तीनों भाई आपके बदले १४ वर्ष वन में रहेंगे।"
भरत जी के इन प्रेम-पूरित वचनों को सुनकर प्रभु श्री राम ने सौगंधपूर्वक कहा कि तीनों लोकों में भरत जैसा भाई न हुआ है और न होगा। प्रभु राम ने भरत को गले लगाते हुए समझाया कि सूर्यवंश की रीति और पिता दशरथ के सत्य-वचन का पालन करना ही हमारा परम धर्म है।
इंद्र की चाल और माता सरस्वती की सीख
चित्रकूट में चारों भाइयों का अनुपम प्रेम और त्याग देखकर स्वर्गलोक में देवराज इंद्र घबरा गए। उन्होंने देवी सरस्वती से प्रार्थना की कि वे भरत जी की बुद्धि फेर दें ताकि राम जी का वनवास पूरा हो सके और राक्षसों का संहार हो।
इस पर देवी सरस्वती ने क्रोधित होकर इंद्र को समझाया कि "भरत जी श्री राम के अनन्य भक्त हैं। जो अयोध्या में हुआ, उसमें भी प्रभु की सहमति थी। यदि भरत की बुद्धि फेरने का दुस्साहस किया तो सर्वनाश हो जाएगा।" इसके बाद देवगुरु बृहस्पति के कहने पर इंद्र सहित सभी देवताओं ने भरत जी के चरणों में प्रीति व्यक्त की।
महाराज जनक और सुनयना जी का आगमन
इसी बीच जनक-दूत ने आकर सूचना दी कि मिथिलापति महाराज जनक अपनी धर्मपत्नी महारानी सुनयना के साथ चित्रकूट पहुंचे हैं। प्रभु श्री राम ने स्वयं आगे बढ़कर उनकी अगवानी की। राम और सीता को तपस्वी वेश में देखकर राजा जनक और महारानी सुनयना भावविभोर हो उठे।
माता कौशल्या और महारानी सुनयना का मिलन अत्यंत मार्मिक रहा। राजा जनक ने महारानी सुनयना को आश्वस्त करते हुए कहा कि भरत जी के समान इस पूरे ब्रह्मांड में कोई दूसरा नहीं है, वे कभी प्रभु राम की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करेंगे।
'स्वामी की बात रखना ही सच्चा प्रेम है' — स्वामी की आज्ञा शिरोधार्य
अंत में भरत जी ने प्रभु श्री राम से अपनी ढिठाई के लिए क्षमा मांगी और कहा कि स्वामी की बात सिर माथे रखना ही सच्चा प्रेम है। प्रभु श्री राम ने भरत जी को धर्म और नीति का ज्ञान देते हुए चरण पादुकाएं (खड़ाऊं) सौंपी और प्रजा व परिवार के पालन का निर्देश दिया।
रात्रि के अंतिम प्रहर में श्वेत-लाल महताबी की अलौकिक रोशनी के बीच निषादराज जी द्वारा आरती संपन्न की गई और 'आरती करिए सियावर की...' के मधुर गायन के साथ लीला को विश्राम दिया गया।


