243 वर्षों का दिव्य संकल्प: विश्वप्रसिद्ध रामनगर रामलीला में गूंजा रावण जन्म और यज्ञ प्रसंग, क्षीरसागर की आरती से लीला का विश्राम
शाही बग्गी और हाथी पर सवार होकर पहुंचे काशी राज परिवार के मुखिया अनंत नारायण सिंह; बिना माइक व लाउडस्पीकर के पेट्रोमैक्स की रोशनी में शुरू हुई रामलीला।
रामनगर/वाराणसी (भदैनी मिरर): काशी की सदियों पुरानी सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर, विश्वप्रसिद्ध रामनगर की रामलीला का शुक्रवार को अनंत चतुर्दशी के पावन अवसर पर पारंपरिक भव्यता और आस्था के साथ शुभारंभ हो गया। 243वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी इस ऐतिहासिक रामलीला के पहले दिन रावण जन्म, उसका कठोर तप, ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्ति और देवलोक व पृथ्वी पर बढ़ते अत्याचारों के प्रसंगों का जीवंत मंचन किया गया।

रामनगर की गलियों और निर्धारित लीला स्थलों पर हजारों की संख्या में स्थानीय श्रद्धालु और दूर-दराज से आए 'नेमी' (नियमित लीला प्रेमी) इस अद्वितीय परंपरा के साक्षी बने।
काशी नरेश की शाही सवारी और 'गार्ड ऑफ ऑनर'
परंपरानुसार शाम करीब 5 बजे काशी राज परिवार के मुखिया अनंत नारायण सिंह शाही बग्गी पर सवार होकर रामबाग के मुख्य द्वार के पास पहुंचे। रास्ते भर 'हर-हर महादेव' और 'जय श्री राम' के जयघोष से पूरा वातावरण गुंजायमान रहा।

लीला स्थल पहुंचने पर पीएसी (PAC) के जवानों ने काशी नरेश को 'गार्ड ऑफ ऑनर' दिया। इसके बाद अनंत नारायण सिंह परंपरा के मुताबिक हाथी पर सवार होकर लीला स्थल पहुंचे और प्रथम दिन की रामलीला का अवलोकन किया।
रावण जन्म, ब्रह्मा जी का वरदान और क्षीर सागर की झांकी
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रावण का जन्म व तपस्या: पहले दिन की लीला का प्रारंभ रावण के जन्म प्रसंग से हुआ। जन्म के बाद रावण ने यज्ञ व घोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए। रावण ने वरदान मांगा कि मनुष्य और वानर के अलावा कोई अन्य उसका वध न कर सके। वहीं कुंभकर्ण ने 6 महीने सोने और 1 दिन जागने का वरदान प्राप्त किया।
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लंकनी को अंत का संकेत: लीला में ब्रह्मा जी और लंकनी के संवाद का मंचन हुआ, जिसमें ब्रह्मा जी ने संकेत दिया कि किसी वानर के प्रहार से लंकनी का बेहाल होना ही रावण के अंत की शुरुआत होगी।
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पृथ्वी की पुकार व क्षीर सागर झांकी: रावण के अत्याचारों से त्रस्त होकर पृथ्वी गाय का रूप धरकर ब्रह्मा जी के पास पहुंची। रामचरितमानस के बालकांड की चौपाइयों के गायन और एक घंटे के विराम के बाद 'क्षीर सागर' की भव्य झांकी प्रस्तुत की गई।
1783 से कायम है परंपरा: तकनीक से दूर, पेट्रोमैक्स की रोशनी में मंचन
रामनगर की रामलीला की शुरुआत वर्ष 1783 में तत्कालीन काशी नरेश महाराज उदित नारायण सिंह के शासनकाल में हुई थी।

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4 किलोमीटर में फैला मंच: यह रामलीला किसी बंद सभागार या एक मंच तक सीमित नहीं है, बल्कि लगभग 4 किलोमीटर के दायरे में फैले रामनगर के अलग-अलग ऐतिहासिक स्थलों पर मंचित होती है।
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बिना माइक-लाउडस्पीकर के संवाद: आधुनिकता के दौर में भी यह रामलीला अपनी मूल परंपरा को संजोए हुए है। यहां साउंड सिस्टम, लाउडस्पीकर या आधुनिक लाइटों का प्रयोग नहीं होता। पूरी लीला पेट्रोमैक्स (गैस की रोशनी) में होती है और पात्र अपनी बुलंद आवाज में संवाद बोलते हैं।
4 महीने की कठोर साधना और सात्विक जीवन
रामनगर रामलीला के पात्रों का चयन लीला शुरू होने से करीब 4 महीने पहले एक विशेष प्रक्रिया द्वारा किया जाता है। चयन के बाद सभी पात्रों को ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है और उन्हें केवल सात्विक भोजन दिया जाता है। काशी के कई परिवारों की चौथी पीढ़ी आज भी इस धार्मिक परंपरा का निर्वहन कर रही है।

