पति की मौत की तारीख से ही विधवा को मिलेगी फैमिली पेंशन, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश रद्द; जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ बोली- पेंशन कोई खैरात नहीं, कीमती अधिकार है
भदैनी मिरर (लीगल डेस्क): देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने पारिवारिक पेंशन (Family Pension) को लेकर एक ऐतिहासिक और मानवीय फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी विधवा को पति की मौत की तारीख से ही फैमिली पेंशन पाने का पूर्ण कानूनी अधिकार है। इसे उस तारीख तक सीमित नहीं किया जा सकता जब उसने पहली बार अदालत या ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया हो, खासकर तब जब देरी में महिला की कोई गलती न हो।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला एक दिवंगत रेलवे कर्मचारी की विधवा की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया।
क्या था पूरा मामला?
रेलवे कर्मचारी की मृत्यु वर्ष 2000 में सेवा के दौरान हो गई थी। आपसी मनमुटाव के कारण पति-पत्नी अलग रह रहे थे, जिससे महिला को पति की मृत्यु और नौकरी संबंधी कागजातों की पूरी जानकारी नहीं मिल सकी।

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रेलवे की लापरवाही: पति की मृत्यु के बाद वर्ष 2001 में रेलवे ने उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया।
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लंबी कानूनी लड़ाई: महिला को पति की सही मृत्यु तिथि (12 नवंबर 2000) साबित करने के लिए वर्षों तक सिविल कोर्ट के चक्कर लगाने पड़े।
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हाईकोर्ट का सीमित आदेश: जब महिला ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) और फिर बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया, तो हाईकोर्ट ने पेंशन का अधिकार तो स्वीकार किया, लेकिन इसका वित्तीय लाभ 2000 के बजाय केवल 2014 (जब पहली बार CAT में याचिका दायर हुई थी) से देने का आदेश दिया।
'एस.के. मस्तान बी' केस का दिया हवाला, तरसेम सिंह मामला 'पर इनकुरियम'
हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए महिला सुप्रीम कोर्ट पहुंची। केंद्र सरकार ने 'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम तरसेम सिंह' मामले की आड़ लेते हुए तर्क दिया कि बकाये (Arrears) की वसूली केवल याचिका दायर करने से तीन साल पहले तक ही सीमित होनी चाहिए।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की दलील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि 'एस.के. मस्तान बी बनाम जनरल मैनेजर, साउथ सेंट्रल रेलवे' का पुराना फैसला सीधे तौर पर एक विधवा के पेंशन अधिकारों से जुड़ा है, जिस पर 'तरसेम सिंह' मामले में विचार नहीं किया गया था। इसलिए पूर्व का 'एस.के. मस्तान बी' फैसला ही बाध्यकारी है।
अनुच्छेद 21 का उल्लंघन और 6% ब्याज के साथ भुगतान का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा:
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नियोक्ता की जिम्मेदारी: एम्प्लॉयर (नियोक्ता) का यह कर्तव्य है कि वह विधवा को कानूनी दांव-पेच में उलझाए बिना खुद पेंशन की गणना कर उसे प्रदान करे। इस लाभ से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।
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पेंशन कोई खैरात नहीं: पेंशन कर्मचारी और उसके परिवार का अर्जित और कीमती अधिकार (Property Right) है, कोई दान या तोहफा नहीं।
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश संशोधित किया और रेलवे को निर्देश दिया कि पीड़ित विधवा को 12 नवंबर 2000 से ही पूरी फैमिली पेंशन की बकाया राशि का भुगतान किया जाए। साथ ही, तीन महीने के भीतर इस बकाया राशि पर 6% वार्षिक ब्याज देने का भी आदेश दिया।
