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सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार: 'जो जज साहब ने बोला, वो आदेश में नहीं लिखा' कहना पड़ा भारी, याचिकाकर्ताओं पर लगा जुर्माना

'हस्ताक्षरित आदेश ही अंतिम', यूट्यूब वीडियो के आधार पर दलील देने पर जताई आपत्ति

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Supreme Court
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान स्पष्ट कर दिया कि अदालत द्वारा हस्ताक्षरित (Signed) आदेश ही अंतिम और अपरिवर्तनीय होता है। कच्छ के चर्चित गोचर भूमि विवाद मामले में याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि जज ने खुली अदालत में जो बोला, वह अंतिम लिखित आदेश में बदल गया। अदालत ने इन आरोपों को 'प्रक्रिया का दुरुपयोग' बताते हुए याचिकाकर्ताओं पर जुर्माना ठोक दिया।

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क्या है 'मौखिक बनाम लिखित' आदेश का विवाद?

जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस एएस चंदुरकर की पीठ ने 'फकीर मोहम्मद सुलेमान समेजा बनाम अडानी पोर्ट्स' मामले की सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि 27 जनवरी की सुनवाई के दौरान जज ने विवादित जमीन पर 'यथास्थिति' (Status Quo) बनाए रखने की बात कही थी। हालांकि, 12 फरवरी को अपलोड हुए अंतिम आदेश में इसका जिक्र नहीं था और गुजरात सरकार को नया फैसला लेने की अनुमति दे दी गई थी।

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अदालत ने क्यों लगाया जुर्माना?

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए कहा:

  1. हस्ताक्षरित आदेश ही अंतिम: कोर्ट मास्टर को लिखवाया गया आदेश केवल एक 'रफ ड्राफ्ट' होता है। चेंबर में सुधार के बाद जजों के हस्ताक्षर वाला आदेश ही कानूनन मान्य है।

  2. यूट्यूब वीडियो पर आपत्ति: कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं द्वारा यूट्यूब वीडियो और मीडिया रिपोर्ट्स को आधार बनाने पर सख्त नाराजगी जताई। पीठ ने कहा कि अधूरे वीडियो के आधार पर कोर्ट की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचाई जा सकती।

  3. काम का बोझ: बेंच ने समझाया कि जजों पर काम का भारी दबाव होता है (एक दिन में 71 मामले)। ऐसे में ओपन कोर्ट में केवल ढांचा तैयार किया जाता है और बाद में उसे परिष्कृत किया जाता है।

अडानी पोर्ट्स और गोचर भूमि का पूरा मामला

यह विवाद 2005 का है, जब कच्छ के नवीनल गांव की 231 हेक्टेयर गोचर (चरागाह) जमीन मुंद्रा पोर्ट (अब अडानी पोर्ट्स) को आवंटित की गई थी। ग्रामीणों ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जुलाई 2024 में गुजरात सरकार ने 108 हेक्टेयर जमीन वापस लेने का आदेश दिया, जिसे अडानी पोर्ट्स ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। अडानी पोर्ट्स का कहना था कि जमीन वापसी के आदेश से पहले उनका पक्ष नहीं सुना गया।

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