सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बिचौलिये को रिश्वत देना सरकारी कर्मचारी का अपराध साबित करने के लिए काफी नहीं
भ्रष्टाचार मामले में पूर्व RPF अधिकारी भरत राज मीणा बरी; शीर्ष अदालत बोली— "थर्ड पार्टी को पैसा मिलना सीधे तौर पर अधिकारी को दोषी नहीं बनाता"
नई दिल्ली / भदैनी मिरर: सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि केवल यह साबित हो जाना कि शिकायतकर्ता और किसी बिचौलिये (जिसने किसी अधिकारी का नाम लिया हो) के बीच पैसों का लेन-देन हुआ, यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि उस सरकारी कर्मचारी ने रिश्वत मांगी या स्वीकार की थी।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस कानूनी सिद्धांत के आधार पर पूर्व रेलवे सुरक्षा बल (RPF) अधिकारी भरत राज मीणा को भ्रष्टाचार के आरोपों से बरी कर दिया।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के एक ट्रैप (Trap) से जुड़ा था। RPF कर्मचारी पी.पी. नंदकुमार ने आरोप लगाया था कि उनकी मनचाही पोस्टिंग के लिए ₹10,000 की रिश्वत मांगी गई थी। सीबीआई का आरोप था कि आरोपी अधिकारी भरत राज मीणा ने कॉन्स्टेबल अनंत नारायणन (मध्यस्थ) के माध्यम से रिश्वत की मांग की थी। बाद में सीबीआई ने कॉन्स्टेबल को रिश्वत की राशि लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा था।

ट्रायल कोर्ट ने आरोपी मीणा को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7, 13(1)(a) और 13(2) के तहत दोषी ठहराया था, जिसे केरल हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था। इसके खिलाफ आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां:
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कड़ी साबित करना अनिवार्य: फैसला सुनाते हुए जस्टिस कोटिश्वर सिंह ने कहा कि किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा रिश्वत के पैसे लेना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह पैसा आरोपी अधिकारी के लिए ही था या उस तक पहुंचा। अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा।
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संदेह से परे सबूत जरूरी: कोर्ट ने 2015 के प्रसिद्ध 'आर.पी.एस. यादव बनाम सीबीआई' मामले का हवाला देते हुए दोहराया कि पैसे की मांग और बिचौलिये को राशि सौंपना ही काफी नहीं है। ठोस साक्ष्यों के जरिए उस पूरी कड़ी (Chain) को उस बिंदु तक साबित करना जरूरी है, जिससे यह दिखे कि पैसा वास्तव में आरोपी तक पहुंचा।
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संदेह का लाभ (Benefit of Doubt): अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष मामले को 'उचित संदेह से परे' (Beyond Reasonable Doubt) साबित नहीं कर सका, इसलिए आरोपी अधिकारी की सजा को बरकरार नहीं रखा जा सकता।
शीर्ष अदालत ने निचली अदालत और हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए पूर्व RPF अधिकारी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

