चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का इनकार; याचिकाकर्ता को CJI सूर्यकांत के पास जाने का निर्देश
जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने कहा- सीजेआई ही मास्टर ऑफ रोस्टर: बेंच में शामिल जज के बेटे के चुनाव आयोग का वकील होने पर उठा सवाल; रिकॉल याचिका पर सुनवाई से इनकार
नई दिल्ली / भदैनी मिरर: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति से जुड़े वर्ष 2023 के अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर देश की सर्वोच्च अदालत से बड़ी खबर सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया है, जिसमें इस मामले को पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजने वाले आदेश को वापस लेने (Recall) की मांग की गई थी।

मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस दीपांकर दत्ता ने याचिकाकर्ता के वकील से स्पष्ट शब्दों में कहा कि मुख्य न्यायाधीश (CJI) ही 'मास्टर ऑफ रोस्टर' (Master of Roster) हैं, इसलिए याचिकाकर्ता अपनी मांग को लेकर सीजेआई सूर्यकांत के समक्ष जाएं।
जज के बेटे के चुनाव आयोग का वकील होने पर उठा सवाल
यह याचिका नमन श्रेष्ठ द्वारा दायर की गई थी, जो सीईसी और ईसी अधिनियम, 2023 की वैधता को चुनौती देने वाले प्रमुख याचिकाकर्ताओं में से एक हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने जस्टिस दीपांकर दत्ता के समक्ष इस याचिका का उल्लेख करते हुए तुरंत सुनवाई की मांग की।
शंकरनारायणन ने दलील दी कि आदेश को वापस लेने की मांग इस आधार पर की जा रही है कि पूर्व में सुनवाई करने वाली दो जजों की पीठ में शामिल जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा को स्वयं को इस मामले से अलग (Recuse) कर लेना चाहिए था। याचिका के अनुसार, जस्टिस शर्मा के बेटे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनाव आयोग की ओर से वकालत करते हैं। याचिका में कहा गया कि मामले की पांच बार सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने नहीं लाया गया और 23 सितंबर के आदेश के दो दिन बाद मीडिया रिपोर्ट्स के जरिए इसकी जानकारी मिली।
23 सितंबर को आया था जजों का बंटा हुआ फैसला (Split Verdict)
उल्लेखनीय है कि 23 सितंबर को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने इस मामले को संविधान पीठ को भेजने को लेकर बंटा हुआ (Split Verdict) फैसला सुनाया था:
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जस्टिस दीपांकर दत्ता का रुख: उनका मानना था कि अधिनियम को चुनौती देने वाले मामले पर पूर्व के स्थापित कानूनी सिद्धांतों के आधार पर ही विचार किया जा सकता है, इसलिए इसे संविधान पीठ को भेजने की आवश्यकता नहीं है।
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जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा का रुख: उनकी राय अलग थी। उन्होंने कहा कि इस मामले में संविधान की व्याख्या से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण सवाल शामिल हैं, इसलिए अनुच्छेद 145(3) के तहत कम से कम पांच जजों की संविधान पीठ द्वारा इसकी सुनवाई होनी चाहिए।
दोनों जजों के बीच सहमति न बनने पर संयुक्त आदेश पारित कर मामले को मुख्य न्यायाधीश (CJI) के समक्ष रेफर कर दिया गया था। अब इस पूरे मामले की अगली दिशा और संविधान पीठ के गठन का फैसला सीजेआई सूर्यकांत ही करेंगे।
