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Supreme Court: तलाक के मामलों में पति नहीं ले पाएगा 'निजता के अधिकार' की ओट, एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर साबित करने के लिए पत्नी को मिलेंगे होटल और CDR रिकॉर्ड

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को रखा बरकरार; कहा- निजता का अधिकार असीमित नहीं, पत्नी के वैधानिक अधिकार भी हैं जरूरी

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नई दिल्ली: वैवाहिक विवादों और तलाक के मामलों में 'निजता के अधिकार' (Right to Privacy) को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस ऐतिहासिक आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें कहा गया था कि तलाक के मुकदमों में पति पर लगे एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर (विवाह-बाह्य संबंध) के आरोपों को साबित करने के लिए पत्नी कानूनी तौर पर होटल बुकिंग, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और पेमेंट से जुड़े दस्तावेज जैसे साक्ष्य जुटा सकती है।

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जस्टिस मनमोहन और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अलग रह रहे पति की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हमें हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं दिखाई देती।

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क्या था पूरा मामला और पत्नी के आरोप?

दरअसल, फैमिली कोर्ट में एक महिला की तलाक याचिका पर सुनवाई चल रही थी। पत्नी ने अपने पति पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा था कि उसका पति किसी दूसरी महिला के साथ विवाह-बाह्य संबंध में है और उस रिश्ते से उनकी एक बेटी भी है। पत्नी का दावा था कि उसका पति उस महिला के साथ एक होटल में रुका था। इन आरोपों को साबित करने के लिए पत्नी ने अदालत से होटल के रिकॉर्ड और मोबाइल फोन के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) निकलवाने की गुहार लगाई थी।

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फैमिली कोर्ट ने दिसंबर 2022 में होटल को निर्देश दिया था कि वह संबंधित तारीखों की बुकिंग, ठहरने वालों के पहचान पत्र (ID Proof) और भुगतान का विवरण सीलबंद लिफाफे में अदालत को सौंपे। पति ने इसी आदेश को पहले हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में यह कहकर चुनौती दी थी कि यह उसकी 'निजता के अधिकार' का उल्लंघन है।

हाई कोर्ट ने कहा- निजता का अधिकार पूर्ण या असीमित नहीं

इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने पति की याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा था कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत 'व्यभिचार' (Adultery) तलाक का एक वैध आधार है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ही पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि निजता का अधिकार संविधान द्वारा दिया गया एक मौलिक अधिकार जरूर है, लेकिन यह पूर्ण या असीमित नहीं है। जनहित और न्याय के हित में इस पर उचित वैधानिक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

फैमिली कोर्ट्स एक्ट की धारा 14 का बड़ा हवाला

अदालत ने इस मामले में फैमिली कोर्ट्स एक्ट की धारा 14 का विशेष महत्व बताया। कोर्ट के अनुसार, यह धारा परिवार न्यायालय को व्यापक शक्तियां देती है। इसके तहत अदालत ऐसे किसी भी बयान, रिपोर्ट, दस्तावेज या सामग्री को साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर सकती है, जो विवाद के प्रभावी समाधान में मदद कर सके—भले ही वह सामान्य रूप से भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत स्वीकार्य न हो।

होटल रिकॉर्ड और CDR क्यों हैं महत्वपूर्ण?

न्यायालय ने माना कि व्यभिचार (Adultery) जैसे मामलों में सीधे और प्रत्यक्ष सबूत मिलना बहुत मुश्किल होता है। ऐसे में:

  • होटल रिकॉर्ड: बुकिंग और आईडी प्रूफ से यह साफ हो सकता है कि पति अपनी पत्नी के अलावा किसी अन्य महिला के साथ वहां रुका था या नहीं।

  • कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR): इससे यह स्पष्ट हो सकता है कि पति और संबंधित महिला के बीच बातचीत की आवृत्ति (Frequency) और समय सामान्य सहकर्मियों या मित्रों से अलग था या नहीं।

अदालत की सख्त टिप्पणी: "एक तरफ पति अपनी पत्नी के साथ वैध वैवाहिक संबंध में है, और दूसरी तरफ उस पर बाहर संबंध रखने और उससे संतान होने का आरोप है। ऐसे में केवल निजता के अधिकार का हवाला देकर अदालत ऐसे व्यक्ति को कानूनी संरक्षण नहीं दे सकती। जनहित और पत्नी के वैधानिक अधिकार यहाँ अधिक महत्वपूर्ण हैं।"

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब यह साफ हो गया है कि पारिवारिक अदालतों में सच को सामने लाने के लिए प्रासंगिक डिजिटल और दस्तावेजी सबूत जुटाने में महिलाओं को कानूनी अड़चनों का सामना नहीं करना पड़ेगा।