POCSO Act: शारीरिक सजा देना यौन अपराध नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल टीचर के खिलाफ दर्ज केस किया रद्द
शीर्ष अदालत ने कहा- गलत व्यवहार या शारीरिक दंड में 'यौन मंशा' का होना जरूरी, बिना ठोस आधार के ट्रायल से शिक्षक का करियर हो जाएगा बर्बाद
लीगल डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act, 2012) की धारा 10 के तहत एक स्कूल शिक्षक के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को पूरी तरह निरस्त (Quash) कर दिया है। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी शिक्षक द्वारा छात्रों को शारीरिक सजा (Corporeal Punishment) देना या संवेदनहीन व्यवहार करना भले ही अनुचित हो, लेकिन जब तक इसमें कानूनी रूप से 'यौन मंशा' (Sexual Intent) साबित न हो, तब तक इसे यौन अपराध नहीं माना जा सकता।

क्या था पूरा मामला?
यह मामला पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार स्थित एक स्कूल का है, जहां भूगोल (Geography) के शिक्षक पर 10वीं कक्षा की छात्राओं को अनुचित तरीके से छूने, थप्पड़ मारने और पीठ पर चुटकी काटने का आरोप लगा था। महिला शिक्षिकाओं और हेडमास्टर की सूचना पर जिला बाल संरक्षण इकाई (DCPU) ने जांच की और पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेते हुए शिक्षक के खिलाफ FIR (केस संख्या 187/2025) दर्ज की। शिक्षक ने मामले को रद्द कराने के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट (जलपाईगुड़ी सर्किट बेंच) का दरवाजा खटखटाया, लेकिन हाईकोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

जस्टिस उज्ज्वल भूयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच का रुख
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस उज्ज्वल भूयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने पीड़ितों के बयानों और जांच रिपोर्ट का गहन विश्लेषण किया। कोर्ट ने पाया कि जब छात्राएं कक्षा में ध्यान नहीं दे रही थीं या भूगोल का मैप नहीं लाई थीं, तब शिक्षक ने उन्हें थप्पड़ मारा या शारीरिक सजा दी।

अदालत ने कहा, "एक जिम्मेदार शिक्षक के रूप में अपीलकर्ता को इस स्थिति को अधिक संवेदनशीलता से संभालना चाहिए था, लेकिन शिक्षक की इस कमी या शारीरिक सजा देने मात्र से POCSO Act की धारा 10 लागू नहीं हो जाती।"
यौन मंशा (Sexual Intent) की अनिवार्यता पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो अधिनियम के प्रावधानों का हवाला देते हुए दोहराया कि धारा 7 और धारा 9(f) के तहत 'यौन उत्पीड़न' का अपराध सिद्ध होने के लिए आरोपी की 'यौन मंशा' का होना सबसे अनिवार्य शर्त है। छात्राओं के बयानों से यह स्पष्ट नहीं होता कि शिक्षक का उद्देश्य यौन उत्पीड़न करना था।
शिक्षकों पर पॉक्सो के झूठे या असमझदारी भरे आरोपों का गंभीर असर
शीर्ष अदालत ने चिंता जताते हुए कहा कि किसी शिक्षक पर पॉक्सो जैसा गंभीर आरोप लगना ही उसके करियर और सामाजिक जीवन के लिए 'मौत की घंटी' जैसा होता है।
अदालत ने टिप्पणी की, "लड़कियों या को-एजुकेशनल स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक के लिए ऐसे मुकदमे का मतलब उसके पूरे करियर और जीवन की तबाही है। यदि ऐसे मामलों में बिना यौन मंशा के लंबा ट्रायल चलता है और बाद में वह बरी भी हो जाता है, तब भी उस नुकसान की भरपाई कभी नहीं की जा सकती जो उसने और उसके परिवार ने झेला है।"
हाईकोर्ट का आदेश रद्द, ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही निरस्त
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस मामले में मुकदमा जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। बेंच ने कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए अलीपुरद्वार की स्पेशल कोर्ट में चल रहे स्पेशल केस नंबर 83/2025 की पूरी कार्यवाही को निरस्त कर दिया। हालांकि, अदालत ने हिदायत दी कि शिक्षकों को कम उम्र के छात्रों के साथ व्यवहार करते समय हमेशा संवेदनशील रहने की आवश्यकता है।
