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ऑपरेशन सिंदूर: 'शहीदों को सम्मान देने में देरी क्यों?' सैन्य गोपनीयता और सरकार की जवाबदेही पर उठे बड़े सवाल

एक साल बाद माना कि देश के 6 जांबाज हुए थे शहीद; संसद में दिए गए बयान और जमीनी हकीकत में अंतर को लेकर विवाद तेज

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rajnath singh
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नई दिल्ली (भदैनी मिरर डेस्क): युद्ध और सैन्य अभियानों में रणनीतिक गोपनीयता (Operational Secrecy) बेहद जरूरी है, लेकिन क्या इसकी आड़ में लोकतांत्रिक जवाबदेही से समझौता किया जा सकता है? यह सवाल इस समय देश के रक्षा और राजनीतिक गलियारों में गूंज रहा है। केंद्र सरकार द्वारा 'ऑपरेशन सिंदूर' (Operation Sindoor) में सर्वोच्च बलिदान देने वाले देश के 6 जवानों को औपचारिक रूप से स्वीकार करने और उन्हें सम्मान देने में एक साल से अधिक का समय लगाने पर अब गंभीर चर्चा शुरू हो गई है।

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क्या था 'ऑपरेशन सिंदूर'?

अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए एक भीषण आतंकी हमले में 26 निर्दोष नागरिकों की जान चली गई थी। इस कायराना हमले के जवाब में भारतीय सेना और वायुसेना ने पाकिस्तान के खिलाफ सीमा पार एक बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया, जिसे 'ऑपरेशन सिंदूर' नाम दिया गया। मई 2025 में यह ऑपरेशन सफलतापूर्वक पूरा हुआ, जिसे सरकार ने अपनी एक बड़ी रणनीतिक कामयाबी के तौर पर पेश किया था।

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गोपनीयता बनाम जवाबदेही: कहां चूकी सरकार?

ऑपरेशन खत्म होने के ठीक बाद 11 मई 2025 को तत्कालीन सैन्य अभियान महानिदेशक (DGMO) लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने प्रेस ब्रीफिंग में जवानों के सर्वोच्च बलिदान को नमन किया था, लेकिन तब उनके नामों का खुलासा नहीं किया गया था। अब रक्षा विशेषज्ञों और आलोचकों का मानना है कि जवानों की शहादत को तुरंत सार्वजनिक रूप से स्वीकार न करना किसी समझदारी भरी रणनीति का हिस्सा नहीं था।

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संसद में दिए बयान पर क्यों मचा है बवाल?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा विवाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के संसद में दिए बयान को लेकर है:

  • 28 जुलाई 2025 को लोकसभा में बयान: रक्षा मंत्री ने कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान "किसी भी भारतीय सैनिक को नुकसान नहीं पहुंचा।"

  • अब सरकार की सफाई: संसद को गुमराह करने के आरोपों के बाद अब सरकार स्पष्ट कर रही है कि रक्षा मंत्री का बयान उन रिपोर्टों के संदर्भ में था, जिनमें भारतीय विमानों को मार गिराए जाने का दावा किया जा रहा था। सरकार के अनुसार, उस वक्त यह स्पष्ट किया गया था कि मिशन के दौरान कोई पायलट हताहत नहीं हुआ था।

पर्दे के पीछे क्या हुआ? जवानों को मिले वीरता पुरस्कार

भले ही औपचारिक ऐलान में देरी हुई हो, लेकिन पर्दे के पीछे सेना ने अपने नियमों का पालन किया:

  • शहीद जवानों का अंतिम संस्कार पूरे सैन्य सम्मान के साथ किया गया था।

  • अगस्त 2025 में वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने शहीद सार्जेंट सुरेंद्र कुमार के परिवार से मुलाकात की थी।

  • रक्षा मंत्रालय ने इन जांबाजों के लिए वीरता पुरस्कारों (Gallantry Awards) की घोषणा भी की थी और सेना के आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई थी।

निष्कर्ष: जनता को हिसाब जानने का हक

सरकार का अभी भी मानना है कि संघर्ष के दौरान विमानों और अन्य सैन्य उपकरणों के नुकसान से जुड़ी जानकारियां रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील हैं, इसलिए इन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।

हालांकि, यह समझना बेहद जरूरी है कि युद्ध की कीमत हमेशा देश की जनता चुकाती है। ऐसे में जीत और नुकसान का एक पारदर्शी लेखा-जोखा ही भविष्य में बेहतर और सटीक निर्णय लेने का सबसे सही रास्ता है। देश के लिए जान न्योछावर करने वाले शहीदों का सम्मान तुरंत और पूरी गरिमा के साथ होना ही राष्ट्र का उनके प्रति सच्चा आभार है।