Monsoon Session 2026: क्या मॉनसून सत्र में बैकफुट पर रही सरकार?
परिसीमन, एक देश-एक चुनाव और FCRA संशोधनों पर क्यों अटकी बात? जानिए विपक्ष के दावों, युवा आंदोलन और राजनीतिक विश्लेषकों की पड़ताल
भदैनी मिरर (राजनीतिक विश्लेषक डेस्क): लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के साथ ही संसद का 25 दिनों तक चला हंगामेदार मॉनसून सत्र 2026 समाप्त हो गया। इस सत्र के दौरान कई विवादित विधेयकों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली।


सत्र के समापन के बाद मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने दावा किया कि संयुक्त विपक्ष की एकजुटता के सामने सरकार को झुकना पड़ा और परिसीमन (Delimitation), 'एक देश-एक चुनाव' (One Nation, One Election), एफ़सीआरए (FCRA) और उच्च शिक्षा सुधार जैसे अहम विधेयकों पर कदम पीछे खींचने पड़े। हालांकि, वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों की राय इस पर बंटी हुई है।

विपक्ष की 'जीत' के रूप में पेश किए जा रहे ये 5 बड़े मुद्दे
कांग्रेस और विपक्षी खेमे का दावा है कि उनके दबाव के कारण सरकार को निम्नलिखित प्रस्तावों पर पीछे हटना पड़ा:
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परिसीमन संविधान संशोधन विधेयक: केंद्र सरकार सत्र में परिसीमन से जुड़ा विधेयक लाने की तैयारी में थी, लेकिन दक्षिण भारतीय राज्यों (विशेषकर तमिलनाडु) और विपक्षी दलों के विरोध के चलते इसे टालना पड़ा। दक्षिण भारत को आशंका है कि परिसीमन से लोकसभा में उनकी सीटों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
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FCRA संशोधन विधेयक जेपीसी को भेजा गया: विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक पर विपक्ष और ईसाई संगठनों के कड़े विरोध के बाद सरकार इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजने पर सहमत हुई।
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उच्च शिक्षा सुधार विधेयक नहीं हुआ पेश: यूजीसी (UGC) समेत विभिन्न नियामक निकायों की जगह एक केंद्रीय निकाय बनाने वाला विधेयक कार्यसूची में होने के बावजूद सदन में पेश नहीं किया गया।
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'एक देश-एक चुनाव' बिल पर विराम: विपक्षी नेताओं का दावा है कि सर्वदलीय बैठक में संकेत मिलने के बावजूद इसे संसद में नहीं लाया जा सका।
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स्वतः बर्खास्तगी (130वां संविधान संशोधन) बिल: गिरफ्तार मंत्रियों को 30 दिन तक जमानत न मिलने पर स्वतः पद से हटने वाले विधेयक को भी विरोध के चलते आगे नहीं बढ़ाया जा सका।
FCRA बिल पर नरमी: अंतरराष्ट्रीय प्रभाव या रणनीतिक कदम?
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने दावा किया कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से हुई बातचीत और विदेशी दबाव के कारण एफ़सीआरए बिल पर सरकार का रुख नरम पड़ा।


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पत्रकारों का नजरिया: वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, किसी फोन वार्ता को सीधे अंतरराष्ट्रीय दबाव का सबूत नहीं माना जा सकता।
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जमीनी वजह: 9 अगस्त को कई प्रमुख ईसाई संगठनों ने सोशल मीडिया के जरिए सरकार से बिल वापस लेने या जेपीसी को भेजने की सामूहिक अपील की थी, जिसके बाद गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में इसे JPC के पास भेजने का प्रस्ताव रखा।
परिसीमन बिल पर क्यों बदली सरकार की रणनीति?
वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि परिसीमन बिल को पास कराने के लिए सरकार ने रणनीतिक मोर्चेबंदी की थी। अकाली दल प्रमुख सुखबीर सिंह बादल और कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों के समर्थन से सरकार को उम्मीद थी कि वह आवश्यक बहुमत जुटा लेगी।
क्यों बैकफुट पर आई सरकार?
दक्षिण भारत का एकजुट विरोध: तमिलनाडु विधानसभा में सत्ताधारी TVK और विपक्षी DMK समेत सभी दलों ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर लोकसभा सीटों की मौजूदा संख्या (543) बनाए रखने की मांग की।
महिला संगठनों का प्रदर्शन: महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़े जाने के खिलाफ 'नेशनल कोएलिशन ऑफ विमेन्स रिजर्वेशन' के बैनर तले हुए प्रदर्शनों ने भी सरकार पर दबाव बनाया।
उपचुनाव के संकेत: बिहार के बंकीपुर उपचुनाव के नतीजों ने भी सत्ता पक्ष को राजनीतिक समीकरणों पर पुनर्वचार करने पर मजबूर किया।
युवा आंदोलन का असर या सरकार की 'स्मार्ट क्राइसिस मैनेजमेंट'?
सत्र की शुरुआत में दिल्ली में हुए युवा आंदोलनों और पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर संसद में 12 दिनों तक गतिरोध बना रहा।
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एक पक्ष (विपक्ष और युवा दबाव): विश्लेषकों के अनुसार, शिक्षा और रोजगार के मुद्दे पर युवाओं के प्रदर्शन और जेजी (Gen-Z) पीढ़ी के आक्रोश ने सरकार के रुख को प्रभावित किया। बीते 12 सालों में यह पहला मौका दिखा जब सरकार बैकफुट पर नजर आई।
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दूसरा पक्ष (सरकार की रणनीति): दूसरी ओर, पत्रकारों का एक वर्ग इसे सरकार की रणनीति मानता है। हंगामे के बीच सरकार ने बिना विस्तृत चर्चा के 12 महत्वपूर्ण विधेयक पारित करा लिए। साथ ही, संवेदनशील मुद्दों पर सदन में जवाब देने से भी बच निकली।
सत्र का लेखा-जोखा: उत्पादकता और मिनटों में पास हुए बिल
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के अनुसार, सत्र के दौरान कुल 12 विधेयक पास हुए। हालांकि, चर्चा और बहस के लिहाज से उत्पादकता काफी कम रही:
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लोकसभा उत्पादकता: मात्र 19%
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राज्यसभा उत्पादकता: 39%
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जल्दबाजी में पारित बिल: 11 में से 9 विधेयकों पर लोकसभा में 15 मिनट से भी कम चर्चा हुई।
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प्रश्नकाल का न चलना: विपक्ष द्वारा हंगामे के कारण प्रश्नकाल का बाधित होना अंततः सरकार के ही मुफीद रहा, क्योंकि इससे सरकार की सीधी जवाबदेही टल गई।
