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2008 Ahmedabad Serial Blast Case: गुजरात हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, 38 गुनहगारों की फांसी और 11 की उम्रकैद बरकरार

Ahmedabad Serial Blast: साल 2008 में अहमदाबाद को दहलाने वाले आतंकियों को गुजरात उच्च न्यायालय से कोई राहत नहीं मिली है। हाई कोर्ट ने विशेष अदालत के ऐतिहासिक फैसले पर मुहर लगाते हुए पीड़ितों के लिए मुआवजे की समय सीमा भी तय की है।

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गांधीनगर/अहमदाबाद: गुजरात उच्च न्यायालय (Gujarat High Court) ने मंगलवार (7 जुलाई) को साल 2008 के अहमदाबाद सीरियल बम धमाकों के मामले में बेहद ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने इस भीषण आतंकी हमले के 38 दोषियों को मिली फांसी की सजा (सजा-ए-मौत) को बरकरार रखा है। इसके साथ ही, अदालत ने मामले के 11 अन्य दोषियों को दी गई उम्रकैद (आजीवन कारावास) की सजा को भी कायम रखा है और उन्हें किसी भी तरह की राहत देने से साफ इनकार कर दिया।

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बता दें कि 26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में हुए इन सिलसिलेवार धमाकों में 56 बेकसूर लोगों की जान चली गई थी और 246 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।

पीड़ितों के लिए मुआवजे का आदेश, 31 मार्च 2027 तक करना होगा भुगतान

हाई कोर्ट ने सजा बरकरार रखने के साथ ही राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह धमाकों के पीड़ितों और उनके परिवारों को उचित वित्तीय सहायता प्रदान करे। कोर्ट ने मुआवजे की राशि और समय सीमा तय करते हुए कहा है कि:

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  • मृतकों के परिजनों को: ₹10 लाख की अनुग्रह राशि दी जाएगी।

  • गंभीर रूप से घायलों को: ₹5 लाख की आर्थिक मदद मिलेगी।

  • सामान्य रूप से घायलों को: ₹1 लाख का मुआवजा दिया जाएगा।

डेडलाइन: गुजरात सरकार को हर हाल में 31 मार्च, 2027 तक सभी पीड़ितों को इस मुआवजे का भुगतान पूरा करना होगा।

गोधरा कांड का बदला लेने के लिए अस्पतालों को बनाया था निशाना

अदालत की कार्यवाही और क्राइम ब्रांच की जांच में यह साबित हुआ था कि साल 2008 में हुए ये धमाके देश के इतिहास में पहली बार किसी अस्पतालों को निशाना बनाकर किए गए थे। आतंकियों ने धमाकों के बाद जो धमकी भरे ईमेल भेजे थे, उसमें उन्होंने दावा किया था कि यह हमला साल 2002 के गोधरा कांड के बाद गुजरात में हुई हिंसा का बदला था।

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निचली अदालत ने 49 को ठहराया था दोषी

गौरतलब है कि अहमदाबाद की एक विशेष अदालत ने फरवरी 2022 में इस मामले की लंबी सुनवाई के बाद कुल 78 आरोपियों में से 49 लोगों को दोषी करार दिया था। वहीं, पुख्ता सबूतों के अभाव में 28 अन्य आरोपियों को बरी कर दिया गया था। बरी होने वालों में मुबीन शेख और मंसूर पीरभॉय जैसे नाम शामिल थे, जिन पर आतंकी साजिश रचने और धमकी भरे ईमेल भेजने का आरोप था।

ट्रायल के दौरान एक सरकारी गवाह (अप्रूवर) को माफ किया गया था, जबकि चार अन्य गवाह जो बाद में अपने बयानों से मुकर गए थे, उन्हें भी कोर्ट ने दोषी ठहराया था। अब हाई कोर्ट ने भी निचली अदालत के इसी कड़े फैसले को पूरी तरह सही माना है।