मक्का समझौता: पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी के नए रक्षा गठबंधन से भारत की सुरक्षा पर क्या पड़ेगा असर?
मक्का रक्षा समझौता: क्या सऊदी और तुर्की के साथ आने से भारत के लिए बढ़ेगी सामरिक चुनौती?
भदैनी मिरर डेस्क: सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में शुक्रवार को एक बड़ा कूटनीतिक और सैन्य घटनाक्रम देखने को मिला। सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने एक त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका पारस्परिक सुरक्षा प्रावधान है—जिसके तहत तीनों में से किसी भी एक देश पर हुआ हमला, तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।


उत्तर-अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के 'अनुच्छेद 5' की तर्ज पर बने इस प्रावधान के बाद अंतरराष्ट्रीय और भारतीय रक्षा विशेषज्ञों के बीच यह बहस छिड़ गई है कि यदि भविष्य में भारत और पाकिस्तान के बीच 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसी कोई दंडात्मक सैन्य कार्रवाई होती है, तो क्या तुर्की और सऊदी अरब भारत के खिलाफ पाकिस्तान का सैन्य साथ देंगे?

शीत युद्ध के बाद पाकिस्तान का नया सैन्य गठबंधन
वासिंंगटन स्थित थिंक टैंक द ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यूशन की सीनियर फेलो डॉ. तन्वी मदान के अनुसार, पाकिस्तान शीत युद्ध के दौर में बने SEATO और CENTO जैसे सैन्य गुटों के लगभग सात दशकों बाद किसी इतने बड़े रक्षा समझौते में शामिल हुआ है। हालांकि, अतीत में अमेरिका ने ऐसे समझौतों में भारत-पाक संघर्ष के दौरान खुद को अलग रखने की शर्तें जोड़ी थीं, लेकिन मक्का समझौते में 'इस्लामिक एकजुटता' पर बल दिया गया है।

क्या भारत के खिलाफ पाकिस्तान की मदद करेंगे सऊदी और तुर्की?
सामरिक मामलों के प्रमुख विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी का मानना है कि यदि भविष्य में भारत, पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों पर कोई सीमित सैन्य या दंडात्मक कार्रवाई करता है, तो इस्लामाबाद इसे पूरे देश पर हमला बताकर इस समझौते के तहत सामूहिक सुरक्षा प्रावधान को लागू करने की मांग कर सकता है। इससे भारत के लिए तनाव को नियंत्रित रखने और डेटरेंस (प्रतिरोध) की रणनीति जटिल हो सकती है।
हालांकि, विश्लेषकों का यह भी मानना है कि सऊदी अरब और तुर्की के रुख में बड़ा अंतर देखने को मिल सकता है:
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सऊदी अरब का आर्थिक हित: भारत और सऊदी अरब के बीच 43 अरब डॉलर से अधिक का द्विपक्षीय व्यापार है। अरामको जैसी सऊदी कंपनियां भारत के ऊर्जा क्षेत्र में अरबों डॉलर के निवेश में भागीदार हैं। इसके अलावा 25 लाख से अधिक भारतीय सऊदी अरब में कार्यरत हैं। इन विशाल आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों के कारण सऊदी अरब भारत के खिलाफ किसी सीधी सैन्य कार्रवाई में शामिल होने से बचेगा।
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तुर्की का रुख: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी तुर्की ने पाकिस्तान को सैन्य और तकनीकी सहायता प्रदान की थी। तुर्की का रक्षा उद्योग काफी मजबूत है और राष्ट्रपति रेचेप तैयप्प अर्दोआन खुद को मुस्लिम जगत के नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश में रहते हैं, जिससे तुर्की का रुख भारत के प्रति अधिक आक्रामक हो सकता है।
'मुस्लिम नेटो' या केवल क्षेत्रीय संतुलन की कोशिश?
मिडिल ईस्ट और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों के बीच इस समझौते को लेकर अलग-अलग राय है:
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प्रतिरोध स्थापित करना, युद्ध बढ़ाना नहीं: तुर्की मामलों की विशेषज्ञ अस्ली आयदिन तब्स का कहना है कि इसे तुरंत 'मुस्लिम नेटो' कहना जल्दबाजी होगी। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय संतुलन और प्रतिरोध (Deterrence) बनाना है, न कि किसी नए युद्ध की शुरुआत करना।
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पैन-इस्लामिक गठबंधन का संकेत: पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल और अन्य विशेषज्ञों का मानना है कि पवित्र दिन (शुक्रवार) और मक्का शहर में इस समझौते पर हस्ताक्षर होना इसे एक वैचारिक और 'पैन-इस्लामिक' रंग देता है।
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अमेरिका का दृष्टिकोण: तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब—तीनों ही अमेरिका के महत्वपूर्ण साझेदार हैं। विश्लेषकों के मुताबिक, वाशिंगटन इस समझौते को क्षेत्रीय सुरक्षा का भार आपस में बांटने के रूप में देखता है, जिससे अमेरिका को कोई सीधी आपत्ति नहीं होगी।
भारत के लिए क्या हैं मायने?
संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व प्रतिनिधि टी.एस. तिरुमूर्ति के अनुसार, पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के समीकरणों में आ रहा यह बदलाव भारत के रणनीतिक दृष्टिकोण से अनुकूल नहीं है। भले ही पाकिस्तान की परमाणु क्षमता और रक्षा नीति मुख्य रूप से भारत- केंद्रित है, लेकिन इस समझौते से पाकिस्तान को कूटनीतिक मंचों पर सऊदी और तुर्की का समर्थन हासिल करने में मदद मिलेगी।
भारत को अब न केवल पाकिस्तान की सैन्य गतिविधियों पर, बल्कि इस नए त्रिपक्षीय गठबंधन के तहत होने वाली रक्षा तकनीकों के आदान-प्रदान और संयुक्त सैन्य अभ्यासों पर भी कड़ी नजर रखनी होगी।
