मराठी सिनेमा और लोककला को बड़ा झटका: दिग्गज अभिनेत्री और लावणी सम्राज्ञी मधू कांबीकर का 73 वर्ष की आयु में निधन
पुणे में अंतिम सांस ली; 'गाढवाचं लग्न', 'शापित' और 'झपाटलेला' जैसी फिल्मों और नाटकों से दिलों पर किया था राज।
पुणे/मुंबई (भदैनी मिरर: मराठी चित्रपट, नाट्यसृष्टी और पारंपरिक लोककला के क्षेत्र से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। मराठी सिनेमा की जानी-मानी और दिग्गज अभिनेत्री तथा प्रसिद्ध लावणी सम्राज्ञी मधू कांबीकर (Madhu Kambikar) का निधन हो गया है। वह 73 वर्ष की थीं। पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य समस्याओं और प्रदीर्घ आजार (लंबी बीमारी) के चलते उनका इलाज चल रहा था, और उन्होंने पुणे में अपनी अंतिम सांस ली। उनके निधन से मराठी कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

बालपण और लोककले का अनूठा सफर
बीड जिले के गेवराई तालुका स्थित माळेगाव में जन्मीं मधू कांबीकर को लोककला का यह समृद्ध वारसा विरासत में मिला था। कोल्हाटी समाज की कला परंपरा का हिस्सा होने के कारण उन्होंने बहुत कम उम्र में ही रंगमंच पर कदम रख दिया था। उन्होंने लावणी और तमाशा जैसी महाराष्ट्र की पारंपरिक लोककलाओं को एक नई ऊंचाई और सम्मान दिलाया।
लोककला के मंच से शुरू हुआ उनका यह सफर आगे चलकर नाटक और मुख्यधारा के सिनेमा तक विस्तृत हुआ। अपने चार दशकों से अधिक लंबे करियर में उन्होंने 75 से अधिक फिल्मों और कई प्रसिद्ध नाटकों में यादगार भूमिकाएं निभाईं।
प्रमुख फिल्में और नाटक
मधू कांबीकर ने अपनी अदायगी और नृत्यों से दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी। उनके द्वारा किए गए कुछ प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:
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प्रमुख फिल्में: शापित, झपाटलेला, गाढवाचं लग्न, विच्छा माझी पूरी करा, वस्त्रहरण, माझा छकुला, बिनकामाचा नवरा, एक होता विदूषक, मुक्ता, और अजब न्याय आदि।
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उनके अभिनय की उत्कृष्टता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें सुपरहिट फिल्म 'शापित' के लिए फिल्मफेयर (मराठी) पुरस्कार और महाराष्ट्र राज्य चित्रपट पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा, साल 2018 में उन्हें मराठी सिनेमा में उनके अमूल्य योगदान के लिए प्रतिष्ठित 'झी चित्र गौरव जीवनगौरव पुरस्कार' से नवाजा गया था।
पैरालिसिस के बाद अभिनय से दूर हो गई थीं
27 नवंबर 2016 को मुंबई के 'यशवंत नाट्यमंदिर' में आयोजित 'लावण्य संगीत' कार्यक्रम के दौरान मंच पर प्रस्तुति देते समय अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई थी। लगभग 12 साल के लंबे अंतराल के बाद वह मंच पर लावणी पेश कर रही थीं। अत्यंत जिजीविषा और जज्बे के साथ उन्होंने अपनी प्रस्तुति पूरी की, लेकिन कार्यक्रम के तुरंत बाद उन्हें पैरालिसिस (अर्धांगवायू) का झटका लगा। तब से लेकर वह अभिनय की दुनिया से दूर थीं और घर पर ही उनका इलाज चल रहा था।
उनके निधन से मराठी कला जगत ने एक ऐसी बेजोड़ कलाकार को खो दिया है, जिन्होंने अपनी कला से लोकसंस्कृति को जीवंत बनाए रखा।
