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Iran War Energy Crisis: ईरान युद्ध से उपजा ऐसा ऊर्जा संकट, जिससे कोई भी देश नहीं बच सकता; दुनिया भर में मची त्राहि-त्राहि

हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की नाकेबंदी से वैश्विक अर्थव्यवस्था पस्त; अमेरिका में महंगाई बढ़ी तो जापान को करनी पड़ी करेंसी इंटरवेंशन

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अंतरराष्ट्रीय डेस्क

 सालों से पर्यावरणविदों और नीति निर्माताओं द्वारा 'क्लीन एनर्जी' (स्वच्छ ऊर्जा) के पक्ष में यह दलील दी जा रही थी कि यह भविष्य के लिए जरूरी है—इससे कार्बन उत्सर्जन कम होगा, लागत घटेगी और दीर्घकालिक स्थिरता आएगी। लेकिन वैश्विक बाजार और सरकारें केवल भविष्य के फायदों को देखकर फैसले नहीं लेतीं; वे तब कदम उठाती हैं जब खतरा सिर पर आ जाता है।

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पिछले आठ हफ्तों में, दुनिया ने उस संभावित खतरे को हकीकत में बदलते देखा है।

शांति वार्ता विफल होने के बाद, संयुक्त राज्य अमेरिका (US) ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की नौसैनिक नाकेबंदी की घोषणा कर दी, जिसके बाद से यह महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पूरी तरह बंद है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के कार्यकारी निदेशक ने ईरान के इस मौजूदा संघर्ष को "इतिहास में वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए अब तक का सबसे बड़ा खतरा" बताया है। इस संकट ने ऊर्जा नीति के उन बुनियादी स्तंभों को हिलाकर रख दिया है, जिन पर दशकों का भरोसा टिका था

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सुरक्षित होने का भ्रम टूटा: हर देश पर पड़ा असर

अब तक यह माना जाता था कि जिन देशों ने घरेलू रिन्यूएबल एनर्जी (नवीकरणीय ऊर्जा) में निवेश किया है, वे युद्ध जनित ऊर्जा संकटों से सुरक्षित रहेंगे। लेकिन इस मौजूदा संकट ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया है। खाड़ी देश के तेल पर सीधे तौर पर निर्भर न रहने वाले क्षेत्र भी इसके आर्थिक झटके झेल रहे हैं:

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वैश्विक खाद्य असुरक्षा

 दुनिया के कुल उर्वरक (Fertilizer) व्यापार का लगभग 30% हिस्सा हॉर्मुज से होकर गुजरता है। गैस आपूर्ति बाधित होने से वैश्विक स्तर पर खाद और खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे पूर्वी अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में भुखमरी का खतरा बढ़ गया है।

करेंसी में ऐतिहासिक गिरावट

इस संकट में प्रवेश करते समय जापान के पास दुनिया का सबसे बड़ा रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (Strategic Petroleum Reserve) था। इसके बावजूद, सप्लाई चेन की बढ़ती लागत के कारण जापानी येन (Yen) इतना कमजोर हो गया कि वहां के अधिकारियों को बाजार में हस्तक्षेप (Currency Intervention) करना पड़ा।

अमेरिका में साख का संकट

 खुद एक शुद्ध ऊर्जा निर्यातक (Net Energy Exporter) होने के बावजूद, संयुक्त राज्य अमेरिका के भीतर ऊर्जा की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, जिससे अर्थव्यवस्था को संभालने की राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं।

भारत का उदाहरण: क्लीन पावर बनाम कच्चे तेल की हकीकत

आधुनिक ऊर्जा प्रणालियों के आपस में जुड़े होने का सबसे सटीक उदाहरण भारत है। फरवरी में भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत जो $69 प्रति बैरल थी, वह मार्च में उछलकर $113 प्रति बैरल के पार पहुंच गई। इसके बाद भारत को तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए दर्जनों देशों से संपर्क साधना पड़ा।

दिलचस्प बात यह है कि भारत ने इस संकट का सामना तब किया जब उसने समय से पहले अपनी स्थापित बिजली क्षमता का 50% से अधिक हिस्सा गैर-फॉसिल (Non-Fossil) स्रोतों से हासिल कर लिया था। हालांकि, क्लीन एनर्जी में इस भारी निवेश के बावजूद भारत वैश्विक तेल बाजार के झटकों से पूरी तरह नहीं बच सका, क्योंकि परिवहन और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए तेल आज भी रीढ़ की हड्डी है।

राहत की बात

इस ग्रीन एनर्जी निवेश ने भारत के पावर ग्रिड (बिजली प्रणाली) पर दबाव को काफी कम कर दिया और ऊर्जा सब्सिडी के कारण सरकारी खजाने पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ को सीमित रखा। इससे भारतीय नीति निर्माताओं को इस संकट से निपटने के लिए थोड़ी राहत मिल गई, जबकि क्षेत्र के अन्य फॉसिल-फ्यूल निर्भर देशों को भारी बिजली कटौती और आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा।

बदल गया क्लीन एनर्जी में निवेश का नजरिया

ईरान के इस युद्ध ने साफ कर दिया है कि जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) पर निर्भर वैश्विक ऊर्जा प्रणाली भौगोलिक चोकपॉइंट्स (Chokepoints) और भू-राजनीतिक जोखिमों से घिरी हुई है, जिससे कोई भी देश अकेले खुद को सुरक्षित नहीं रख सकता।

मार्केट अब इसे एक अस्थायी झटका नहीं, बल्कि जीवाश्म ईंधन के स्थायी रूप से महंगे होने के संकेत के रूप में देख रहा है। यही वजह है कि कैलिफोर्निया, दक्षिणी यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में बीमा कंपनियों ने हाथ खींचने शुरू कर दिए हैं और प्रीमियम बढ़ा दिए हैं। जब बीमा कंपनियां पीछे हटती हैं, तो वह जोखिम गायब नहीं होता, बल्कि वह बोझ सीधे तौर पर सरकारी बजट, कॉरपोरेट बैलेंस शीट और आम जनता की जेब पर आ जाता है।

इस वैश्विक संकट ने साबित कर दिया है कि स्वच्छ ऊर्जा अब केवल पर्यावरण को बचाने का जरिया नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी है, क्योंकि यह हॉर्मुज जैसे किसी भी भू-राजनीतिक झटके से पूरी तरह अछूती है।