BHU में ‘एडवांस्ड मास्टरक्लास ऑन इंट्रापार्टम फीटल सर्विलांस’ शुरू, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ प्रो. एडविन चंद्रहरण देंगे प्रशिक्षण
30 नवंबर–1 दिसंबर तक चलने वाली दो दिवसीय मास्टरक्लास में डॉक्टरों को CTG इंटरप्रिटेशन, भ्रूण हाइपोक्सिया पहचान और पेरिनेटल मृत्यु दर कम करने की उन्नत तकनीकें सिखाई जाएंगी
वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (IMS-BHU) के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग में ‘एडवांस्ड मास्टरक्लास ऑन ऑप्टिमाइजिंग इंट्रापार्टम फीटल सर्विलांस’ का दो दिवसीय आयोजन शुक्रवार से शुरू हो गया। यह कार्यक्रम 30 नवंबर और 1 दिसंबर तक चलेगा, जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध विशेषज्ञ प्रो. एडविन चंद्रहरण, निदेशक-ग्लोबल अकादमी ऑफ मेडिकल साइंसेज़, प्रतिभागियों को प्रशिक्षण देंगे। यह जानकारी पीआरओ ऑफिस में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में आईएमएस के डायरेक्टर एस. एन. शंखवार और प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की प्रोफेसर उषा पांडेय ने दी।


कठिन प्रसव स्थितियों में मातृ एवं भ्रूण मृत्यु दर को कम करना मुख्य उद्देश्य
मास्टरक्लास का प्रमुख लक्ष्य मातृ एवं भ्रूण रोग-क्षमता (morbidity) और मृत्यु दर को कम करना है। कार्यक्रम की शुरुआत इस चर्चा से हुई कि यह उन्नत प्रशिक्षण क्यों अनिवार्य है। विश्वभर में बढ़ते ऐसे मामलों पर प्रकाश डाला गया जहां प्रसव के दौरान भ्रूण को हाइपोक्सिया (ऑक्सीजन की कमी) का सामना करना पड़ता है-जो तीव्र, उप-तीव्र या दीर्घकालिक हो सकता है।

इस हाइपोक्सिया के कारण कई गंभीर जटिलताएँ देखी जाती हैं, जैसे—
- सेरेब्रल पाल्सी
- पेरिनेटल रोग-क्षमता
- पेरिनेटल मृत्यु
इन्हें रोकने के लिए समय से पहचान और सही हस्तक्षेप आवश्यक है।
कार्डियोटोकोग्राफी (CTG) की गहरी समझ पर फोकस
वर्तमान में प्रसव के दौरान भ्रूण की निगरानी का मुख्य माध्यम कार्डियोटोकोग्राफी (CTG) है। लेकिन इसकी व्याख्या में इंटर-ऑब्जर्वर और इंट्रा-ऑब्जर्वर भिन्नता रहती है, विशेषकर जूनियर डॉक्टरों में।

इसके कारण—
- भ्रूण हाइपोक्सिया की पहचान में देरी
- आपातकालीन सीज़ेरियन सेक्शन में विलंब
जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
इसीलिए मास्टरक्लास में रेज़िडेंट्स और कंसल्टेंट्स को फिज़ियोलॉजिकल CTG इंटरप्रिटेशन की उन्नत समझ प्रदान की जा रही है।
गैर-हाइपोक्सिक भ्रूण संकट और नवीन वैज्ञानिक दृष्टिकोण
प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल हाइपोक्सिक तनाव पहचानना नहीं, बल्कि निम्न क्षेत्रों पर भी गहन ज्ञान देना है—
- भ्रूण संकट के गैर-हाइपोक्सिक कारण
- भ्रूण संक्रमण और न्यूरो-इन्फ्लेमेशन के संकेत
- नवीनतम वैज्ञानिक शोध
- क्लिनिकल स्थितियों में फिज़ियोलॉजिकल CTG का उपयोग
अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की सहमति से विकसित CTG इंटरप्रिटेशन मॉडल के माध्यम से चल रहे भ्रूण सूजनजन्य तनाव की समय पर पहचान सम्भव हो सकेगी, जिससे पेरिनेटल परिणामों को बेहतर बनाने में सहायता मिलेगी।
पूर्वी भारत और विकासशील देशों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्रशिक्षण
मास्टरक्लास का व्यापक उद्देश्य उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य विकासशील देशों के अस्पतालों में पेरिनेटल रोग-क्षमता और मृत्यु दर में कमी लाने के लिए डॉक्टरों को उन्नत दक्षता प्रदान करना है।
यह प्रशिक्षण उन क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी होगा जहाँ संसाधन कम होने के बावजूद उच्च जोखिम प्रसव के मामले अधिक संख्या में आते हैं।
