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काशी की गलियों में 'यक्कू' फेम क्रूर सिंह: अखिलेंद्र मिश्रा बोले- इंजीनियरिंग फेल हुआ तो महादेव ने बना दिया अभिनेता-VIDEO

फिल्मों में भाषा के विवाद और AI के दौर पर रखी बेबाक राय, बताया कैसे एक 'ध्वनि' बन गई उनकी पहचान

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वाराणसी। 90 के दशक के कल्ट धारावाहिक 'चंद्रकांता' में अपने खौफनाक मगर दिलचस्प किरदार 'क्रूर सिंह' से घर-घर में पहचान बनाने वाले दिग्गज अभिनेता अखिलेंद्र मिश्रा इन दिनों महादेव की नगरी काशी में आध्यात्मिक यात्रा पर हैं। अपनी यात्रा के पांचवें दिन उन्होंने मीडिया से खास बातचीत में अपने जीवन के संघर्ष, 'यक्कू' के जन्म और बदलते सिनेमाई परिदृश्य पर बेबाकी से अपनी बात रखी।

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इंजीनियरिंग की असफलता ने खोला अभिनय का रास्ता

अखिलेंद्र मिश्रा ने एक दिलचस्प किस्सा साझा करते हुए बताया कि उनकी माँ उन्हें इंजीनियर बनाना चाहती थीं। उन्होंने IIT और BVIT जैसी परीक्षाओं में भाग्य आजमाया लेकिन सफल नहीं हुए। उन्होंने कहा, "शायद भोलेनाथ ने मेरे लिए कुछ और ही तय कर रखा था। अगर मैं एमएससी कर लेता तो आज किसी कॉलेज में लेक्चरर होता, लेकिन नियति मुझे थिएटर और फिर बॉलीवुड ले आई।"

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कैसे हुआ 'यक्कू' का जन्म?

अपने सिग्नेचर संवाद 'यक्कू' पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि यह कोई शब्द नहीं बल्कि एक 'ध्वनि' थी। उन्होंने निर्देशक से एक तकिया कलाम इस्तेमाल करने की अनुमति मांगी थी। उन्होंने इस ध्वनि को अभिनय के नौ रसों (शृंगार से लेकर रौद्र तक) में पिरोया। बच्चों ने इसे 'यक्कू' नाम दिया और आज 35 साल बाद भी लोग उन्हें इसी नाम से पहचानते हैं।

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सिनेमा और भाषा पर बेबाक राय

फिल्मों में भाषा के बढ़ते विवाद पर अखिलेंद्र मिश्रा ने ऐतिहासिक उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि 1930 के दशक में जब धार्मिक फिल्मों में उर्दू का प्रयोग बढ़ा था, तब भी समाज ने कड़ा विरोध किया था, जिसके बाद शुद्ध हिंदी की वापसी हुई। उन्होंने जोर देकर कहा कि "समाज से बढ़कर कुछ नहीं है" और सिनेमा को समाज की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।

AI बनाम अभिनय की ईमानदारी

आज के डिजिटल युग और AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि तकनीकी भले ही कितनी भी उन्नत हो जाए, लेकिन एक कलाकार की ईमानदारी और उसकी 'ट्रेनिंग' का कोई विकल्प नहीं है। डिजिटल क्रांति के बीच भी कलाकार को अपने प्रदर्शन का स्तर बनाए रखना चाहिए।

बाबा के दरबार में मिली शांति

अपनी काशी यात्रा के दौरान उन्होंने श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह में करीब एक घंटे तक शिव स्तुति का पाठ किया और 'काशी के कोतवाल' बाबा काल भैरव का आशीर्वाद लिया। उन्होंने काशी के बदलते स्वरूप और श्रद्धालुओं के लिए बढ़ी सुविधाओं की जमकर सराहना की।