Welcome To The Jungle Movie Review: कमजोर कहानी के 'जंगल' में भटकी फिल्म, अक्षय कुमार और जॉनी लीवर की कॉमेडी ने लगाया लाजवाब तड़का
अहमद खान के निर्देशन में बनी 'वेल्कम ३' में दिखा सितारों का भारी मेला, सोशल मीडिया रील्स के चक्कर में थियेटर का मजा हुआ फीका
भदैनी मिरर एंटरटेनमेंट डेस्क: बॉलीवुड में अक्सर यह मान लिया जाता है कि अगर फिल्म का बजट बड़ा हो और उसमें सितारों की फौज खड़ी कर दी जाए, तो वो सुपरहिट हो जाएगी। निर्देशक अहमद खान की नई फिल्म 'वेल्कम टू द जंगल' (Welcome To The Jungle) भी इसी सोच के साथ सिनेमाघरों में उतरी है। लोकप्रिय फ्रेंचाइजी की यह तीसरी किस्त एक कसी हुई फिल्म लगने के बजाय 164 मिनट का एक वैरायटी शो ज्यादा नजर आती है, जहां निर्देशक कहानी के बजाय भव्यता के फेर में उलझ कर रह गए हैं।


क्या है फिल्म की कहानी?
स्वर्गीय नीरज वोरा की एक 'मेटा-स्टोरी' पर आधारित इस फिल्म की शुरुआत काफी दिलचस्प और बॉलीवुड इंडस्ट्री पर एक कड़ा कटाक्ष करती हुई दिखती है। कहानी में एक भ्रष्ट कॉर्पोरेट हस्ती (जाकिर हुसैन) राजनीतिक माहौल बदलने के कारण काले धन को सफेद करने के लिए एक ऐसी फिल्म बनाने का फैसला करता है, जो बॉक्स ऑफिस पर पक्का फ्लॉप हो।

इस फिल्म-के-अंदर-फिल्म वाले घोटाले से बहुत शानदार कॉमेडी पैदा की जा सकती थी, लेकिन लेखक फरहाद सामजी ने अपनी पुरानी आदत के मुताबिक कहानी की गंभीरता को कमतर तुकबंदी वाले संवादों और बिखरे हुए स्केच कॉमेडी के नीचे दबा दिया। ऐसे में फिल्म को डूबने से बचाने का पूरा दारोमदार अक्षय कुमार और जॉनी लीवर के कंधों पर आ जाता है, जो अपनी कमाल की कॉमिक टाइमिंग से इसे संभाले रखते हैं।

सितारों का मेला और पुराने किरदारों की याद
फिल्म में जॉनी लीवर उस बिजनेसमैन के राइट-हैंड बने हैं, जो घबराहट में अपनी आवाज खो बैठता है। वह दो फ्लॉप निर्देशकों (परेश रावल और राजपाल यादव) को काम पर रखता है जो एक ढलते हुए स्टार राजीव (अक्षय कुमार) को लेकर कहानी बुनते हैं। ग्लैमर का तड़का लगाने के लिए दिशा पटानी और जैकलिन फर्नांडीस को कास्ट किया जाता है।
पुरानी 'वेल्कम' के जादू को बनाए रखने के लिए सुनील शेट्टी और अरशद वारसी भी फिल्म में कदम रखते हैं, जो इस फिल्म-के-अंदर-फिल्म में हीरो बनना चाहते हैं। जब बॉलीवुड के अंदरूनी चुटकुले खत्म होने लगते हैं, तो अहमद खान शूटिंग के बेस को पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) के एक गांव 'आजाद नगर' में शिफ्ट कर देते हैं, जहां जैकी श्रॉफ 'गब्बर सिंह' वाले अंदाज में एक आतंकवादी बने नजर आते हैं।
कमजोर पक्ष: वीएफएक्स और ओवरएक्टिंग की भरमार
फिल्म का सबसे कमजोर पक्ष इसका अत्यधिक 'ग्रीन-स्क्रीन' (VFX) का इस्तेमाल है, जो जंगल के दृश्यों को बिल्कुल नकली बना देता है। एक्शन सीन देखकर ऐसा लगता है जैसे स्क्रिप्ट में बस लिख दिया गया हो—"यहाँ 10 मिनट का अंधाधुंध ड्रामा जोड़ें"।
इसके अलावा, जब अहमद खान अपनी विशाल स्टार कास्ट को ओवरएक्टिंग की तरफ धकेलते हैं, तो कॉमेडी का संतुलन बिगड़ जाता है। स्क्रीन पर इतने सारे जाने-पहचाने चेहरे (कृष्णा अभिषेक, यशपाल शर्मा आदि) हैं कि कई बार दृश्य एक भीड़भाड़ वाले वेटिंग रूम जैसा लगने लगता है, जहां कलाकार सिर्फ अपनी एक लाइन बोलने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते दिखते हैं।
मजबूत पक्ष: सटायर, नॉस्टैल्जिया और अक्षय-रवीना की केमेस्ट्री
कमियों के बावजूद, फिल्म में कुछ बेहतरीन पल भी हैं। फरीदा जलाल और किरण कुमार के बीच का ट्रैजिक-कॉमिक तालमेल फिल्म को एक गहरा सामाजिक सबटेक्स्ट देता है, जो समाज में अल्पसंख्यकों को गलत समझने और उनके मजाक उड़ाए जाने पर एक तीखा और मज़ेदार व्यंग्य है।
फिल्म तब अपने असली रंग में आती है जब एक्टर्स की असली जिंदगी की इमेज का इस्तेमाल स्क्रीन पर मजाक के लिए किया जाता है। जैसे पॉप आइकन दलेर मेहंदी अपनी ही पहचान पर चुटकुले बनाते दिखते हैं। वहीं, अक्षय कुमार एक ऐसे ढलते सितारे के रूप में खुद का मजाक उड़ाते हैं जो अपनी दूसरी पारी की तलाश में है। फिल्म में असली रोमांच तब आता है जब रवीना टंडन स्क्रीन पर एंट्री लेती हैं और अक्षय कुमार के साथ 90 के दशक का वो पुराना जादू एक बार फिर जीवंत हो उठता है।
