AI '80s ट्रेंड का सच: 80 के दशक की 'नॉस्टैल्जिया' के पीछे छिपा क्लाइमेट क्राइसिस और डेटा सेंटर्स का बड़ा खतरा
व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम पर वायरल हो रहे '1980s AI सेल्फी' ट्रेंड के पीछे का स्याह सच; पर्यावरण, क्रिएटर्स के अधिकारों और डेटा सेंटर्स पर उठे गंभीर सवाल
भदैनी मिरर विशेष रिपोर्ट: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर इन दिनों 80 के दशक (1980s Retro Look) का 'AI सेल्फी ट्रेंड' तेजी से छाया हुआ है। केंद्रीय मंत्रियों और पूर्व क्रिकेटरों से लेकर आम लोग तक अपनी 80 के दशक की रेट्रो लुक वाली AI तस्वीरें बनाकर शेयर कर रहे हैं। हालांकि, इस नॉस्टैल्जिया और "बस थोड़ा सा मज़ा" के पीछे एक ऐसा कड़वा सच छिपा है, जिसकी तरफ अक्सर लोगों का ध्यान नहीं जाता—और वह है पर्यावरण पर इसका गंभीर प्रभाव और क्रिएटर्स के अधिकारों का हनन।

नॉस्टैल्जिया की आड़ में डेटा सेंटर्स का भारी दबाव
जेनरेटिव एआई (Generative AI) के जरिए बनाई जाने वाली ये आकर्षित करने वाली तस्वीरें किसी हवा में तैरते "क्लाउड" में नहीं, बल्कि जमीन पर बनी विशालकाय इमारतों—डेटा सेंटर्स (Data Centers) में प्रोसेस होती हैं। इन डेटा सेंटर्स में लगे हजारों सर्वर 24 घंटे चलते हैं, जिन्हें ठंडा रखने के लिए लाखों लीटर पानी और भारी मात्रा में बिजली की खपत होती है।

अकेले OpenAI द्वारा मार्च 2025 में नया इमेज जनरेटर लॉन्च करने के पहले हफ्ते में ही 130 मिलियन यूजर्स ने 700 मिलियन से अधिक तस्वीरें बनाई थीं। एक व्यक्ति की एक फोटो भले ही छोटी लगे, लेकिन जब करोड़ों लोग एक ही ट्रेंड को फॉलो करते हैं, तो यह औद्योगिक स्तर की गतिविधियों में बदल जाता है—वो भी ऐसे समय में जब देश और दुनिया रिकॉर्ड गर्मी, जल संकट और बेमौसम मौसम का सामना कर रही है।

क्रिएटिविटी का भ्रम और कलाकारों का शोषण
इस एआई ट्रेंड का दूसरा पहलू फोटोग्राफरों, चित्रकारों और डिजाइनरों के अधिकारों से जुड़ा है। एआई सिस्टम्स ये रेट्रो और कलात्मक इमेजेस खुद से नहीं बनाते; उन्हें दुनिया भर के उन लाखों कलाकारों के काम (आर्टवर्क) पर ट्रेन किया गया है, जिन्होंने दशकों तक अपनी एक अलग पहचान बनाई। इसके लिए एआई कंपनियों ने न तो कलाकारों से सहमति ली, न ही उन्हें कोई श्रेय या मुआवजा दिया।
व्यक्तिगत जवाबदेही बनाम कॉर्पोरेट मुनाफा
सोशल मीडिया एल्गोरिदम ने हमें 'व्यूज' और 'रीच' की ऐसी दौड़ में ला खड़ा किया है, जहां हम बिना ज्यादा सोचे हर ट्रेंड का हिस्सा बन जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में मेटा जैसी सोशल मीडिया कंपनियों को एंगेजमेंट मिलता है, एआई कंपनियों को नए यूजर्स मिलते हैं और उनके मालिक और अमीर होते जाते हैं। दूसरी ओर, आम लोग आपस में इस बात पर बहस करते रह जाते हैं कि किसका प्लास्टिक स्ट्रॉ या किसकी एआई फोटो पर्यावरण को ज्यादा नुकसान पहुंचा रही है।
व्यक्तिगत विकल्प मायने रखते हैं, लेकिन असली असर इस बात से पड़ता है कि ये बड़ी टेक कंपनियां अपने डेटा सेंटर कहां स्थापित कर रही हैं, कितना पानी निकाल रही हैं और अपने मॉडल्स को किस आधार पर ट्रेन कर रही हैं।
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