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सुर साधना में काव्य से अर्चना का शुभारंभ, झगड़ू भैया की अध्यक्षता में गूंजे गीत और कविताएं

संस्कृति विभाग के आयोजन ‘सुर साधना’ का पहला अध्याय कवि सम्मेलन के रूप में शुरू, वरिष्ठ और युवा रचनाकारों ने किया भावपूर्ण काव्य पाठ।
 

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वाराणसी। संस्कृति विभाग के महत्वाकांक्षी आयोजन ‘सुर साधना’ का पहला अध्याय ‘काव्य से अर्चना’ शनिवार को वाराणसी के अस्सी घाट स्थित मंच पर शुरू हुआ। इस कार्यक्रम का आयोजन सुबह-ए-बनारस आनंद कानन के सहयोग से किया गया, जिसमें शहर के प्रख्यात कवि, रचनाकार और साहित्य प्रेमी बड़ी संख्या में मौजूद रहे।

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कार्यक्रम की अध्यक्षता भोजपुरी के वरिष्ठ कवि झगड़ू भैया ने की, जबकि संयोजन और संचालन का दायित्व वरिष्ठ रचनाकार नवलकिशोर गुप्त ने संभाला। इस मंच की विशेषता यह रही कि इसमें स्थापित और उदीयमान दोनों पीढ़ियों के कवियों को एक साथ मंच मिला।

कार्यक्रम की शुरुआत युवा कवयित्री आकांक्षा बुंदेला के काव्य पाठ से हुई। उन्होंने अपनी मार्मिक रचना - “धरती के दग्ध हृदय पर संगीत कहा लिख दूं मैं,
बिछुड़न की सर्प घटाएं हैं तो, प्रीत कहां से लिख दूं।” से श्रोताओं का दिल जीत लिया।

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इसके बाद प्रो. रचना शर्मा ने अपनी रचना- “रोज नहीं लिखे जाते हैं खत चांदीन में नहाए हुए...” के माध्यम से कार्यक्रम में एक भावनात्मक वातावरण का सृजन किया। हास्य और व्यंग्य के रंग लेकर आए एडवोकेट रुद्रनाथ त्रिपाठी ‘पुंज’, जिन्होंने पं. छन्नूलाल मिश्र को समर्पित काव्यांजलि प्रस्तुत की।

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कार्यक्रम का संचालकीय काव्यपाठ करते हुए नवलकिशोर गुप्त ने अपनी रचना — “जन मानस की शक्ति का देखे तुम परिणाम, चलो एक उद्घोषण करें हम संप्रभुता के नाम।” से आयोजन को सार्थकता प्रदान की।

झगड़ू भैया ने भोजपुरी माटी की सुगंध बिखेरते हुए अंत में ‘सिंदूर की महिमा’ पर केंद्रित गीत प्रस्तुत किया, जो नारी शक्ति को समर्पित था। कार्यक्रम में आगंतुकों का स्वागत योगिराज विजय मिश्रा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. प्रेमनारायण सिंह ने दिया। ‘सुर साधना’ के इस पहले अध्याय ने वाराणसी की सांस्कृतिक धरोहर को फिर से जीवंत कर दिया और यह साबित किया कि काव्य और संगीत की परंपरा आज भी इस नगरी की आत्मा में बसती है।