Alpha Movie Review: आलिया-शर्वरी की 'अल्फा' में सिर्फ अंधाधुंध गोलीबारी और कमजोर कहानी, उम्मीदों पर फिरी पानी
हॉलीवुड की नकल और कमजोर कहानी ने बिगाड़ा खेल; ऋतिक रोशन का कैमियो भी नहीं भर पाया रोमांच, जानें कैसी है फिल्म
मनोरंजन डेस्क: यशराज फिल्म्स (YRF) के स्पाई यूनिवर्स ने अब तक 'टाइगर', 'पठान' और 'वॉर' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया है। इसी कड़ी में पहली बार दो महिला लीड्स—आलिया भट्ट और शर्वरी को लेकर डायरेक्टर शिव रवैल ने फिल्म 'अल्फा' (Alpha) बनाई है। बड़े पैमाने पर बनी इस फिल्म से दर्शकों को काफी उम्मीदें थीं, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट, हॉलीवुड की घिसी-पिटी कॉपियों और उबाऊ एक्शन के चलते 'अल्फा' एक बेहतरीन मौका गंवाती हुई नजर आती है। आइए विस्तार से जानते हैं कि आखिर कहाँ चूक गई यह फिल्म।


हॉलीवुड फिल्मों की सस्ती नकल और कमजोर प्लॉट
फिल्म 'अल्फा' की कहानी (जिसका क्रेडिट उदय चोपड़ा को दिया गया है) में नयापन जैसा कुछ भी नहीं है। फिल्म को देखते हुए आपको हॉलीवुड की 'ब्लैक विडो', 'ला फेमे निकिता', 'हैन्ना' और यहाँ तक कि 'स्ट्रेंजर थिंग्स' की यादें आने लगेंगी। 'टाइगर' या 'पठान' जैसी फिल्मों में भी कहानी बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन वहां स्टार्स के तगड़े औरा (Aura) और स्क्रीन प्रेजेंस ने कमजोरियों को छुपा लिया था।

'अल्फा' में आलिया भट्ट को एक सुपर सोल्जर (सीता) के रूप में दिखाया गया है, जिसके खून में एक बेहद शक्तिशाली सीरम दौड़ रहा है। वह अकेले ही कमांडो की पूरी फौज से लोहा लेती नजर आती हैं, लेकिन यह पूरा सेटअप स्क्रीन पर बेहद अविश्वसनीय और बचकाना लगता है।
एक्शन हीरोइन के सांचे में फिट नहीं बैठीं आलिया भट्ट
इसमें कोई दोराय नहीं है कि आलिया भट्ट मौजूदा दौर की बेहतरीन अभिनेत्रियों में से एक हैं। 'राज़ी', 'हार्ट ऑफ स्टोन' और 'जिगरा' जैसी फिल्मों में उन्होंने अपनी शानदार एक्टिंग का लोहा मनवाया है, लेकिन जब बात एंजेलिना जोली या स्कारलेट जोहानसन जैसी लार्जर-देन-लाइफ (धमाकेदार) एक्शन हीरोइन बनने की आती है, तो आलिया इस सांचे में फिट बैठती नहीं दिखतीं। स्पैन्डेक्स आउटफिट और चोटियों वाले लुक में भी वह उस खतरनाक जासूस वाले औरा को नहीं पकड़ पाईं। उनका किरदार बेहद सुस्त लिखा गया है, जो केवल 'खाली एटीट्यूड और अंतहीन गोलीबारी' के भरोसे आगे बढ़ता है।

शर्वरी में दिखी जान, लेकिन किरदारों के नाम पर केवल खानापूर्ति
फिल्म में शर्वरी (दुर्गा) आलिया की सिस्टर और साइडकिक के रोल में हैं। आलिया के गंभीर और उबाऊ रवैये की तुलना में शर्वरी का 'स्कूल गर्ल' वाला उत्साह फिल्म में थोड़ी जान फूंकता है। हालांकि, फिल्म का पूरा फोकस आलिया के सोलो सीन्स पर रखने के चक्कर में शर्वरी के वॉरियर स्किल्स को किनारे कर दिया गया। बॉलीवुड की पुरानी आदत के मुताबिक, देवियों के नाम (सीता और दुर्गा) पर किरदारों का नाम रख देने भर से महिला सशक्तिकरण नहीं हो जाता, और यह फिल्म इसी का उदाहरण है।
विलेन के रूप में बॉबी देओल का बासी अंदाज और अनिल कपूर की बेबसी
फिल्म में विलेन बने बॉबी देओल भारी-भरकम देशभक्ति के डॉयलॉग्स बोलते नजर आते हैं, जो अब बेहद पुराने और बासी (Stale) लगने लगे हैं। वहीं, सीनियर एक्टर अनिल कपूर पूरी फिल्म में ऐसे तैयार बैठे दिखते हैं जैसे उनके पास करने को कुछ खास हो ही न। उनका किरदार पुरानी हिंदी फिल्मों की उस पुलिस जैसा है, जो सब कुछ खत्म होने के बाद केवल अंत में एंट्री लेती है।
ऋतिक रोशन का कैमियो और कमजोर एक्शन
वाईआरएफ स्पाई यूनिवर्स की परंपरा को निभाते हुए फिल्म में ऋतिक रोशन (कबीर के रूप में) का स्पेशल अपीयरेंस कराया गया है। लेकिन उन्हें "ये साधु नहीं फाडू है" जैसे बेहद घटिया डायलॉग्स दिए गए हैं। ऋतिक के आते ही फिल्म की दोनों जांबाज हीरोइनें स्क्रीन पर महज 'फैनगर्ल्स' की तरह उनके अगल-बगल खड़ी मुस्कुराती रह जाती हैं, जिससे किरदारों की बची-कुची गरिमा भी खत्म हो जाती है।
फिल्म की शूटिंग स्पेन, कश्मीर और लद्दाख जैसी खूबसूरत वादियों में की गई है, जो देखने में तो शानदार लगती है, लेकिन एक्शन सीन्स पूरी तरह से नकली लगते हैं। लात-घूंसों के प्रभाव को दिखाने के लिए कलाकारों के बजाय कैमरे को इतनी तेजी से हिलाया गया है कि दर्शकों का सिर चकरा जाए। हालांकि, संचित और अंकित बलहारा का बैकग्राउंड इलेक्ट्रॉनिक स्कोर काफी दमदार है और वह फिल्म में थोड़ा एड्रेनालाईन पंप करने का काम करता है।
