Movie prime
PMC_Hospital

"लॉफुल हो तो डीएनए टेस्ट से क्या दिक्कत?" पति के शक पर सुप्रीम कोर्ट ने महिला को दिया बड़ा झटका

पिता होने के शक पर पति ने मांगी थी डीएनए टेस्ट की अनुमति, पति के पास पहले से मौजूद थी प्राइवेट लैब की डीएनए रिपोर्ट

Ad

 
Supreme Court
WhatsApp Group Join Now

Ad

Ad

भदैनी मिरर (Bhadaini Mirror) डेस्क: वैवाहिक विवादों (Matrimonial Disputes) से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जरूरत पड़ने पर बच्चे की पितृत्व जांच (Paternity Test/DNA Test) कराई जा सकती है। शीर्ष अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें पति की याचिका पर बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने की मंजूरी दी गई थी। साथ ही, अदालत ने इस टेस्ट के खिलाफ महिला द्वारा दाखिल की गई याचिका को खारिज कर दिया है।

Ad
Ad

यह सुनवाई जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की बेंच के समक्ष हुई।

पति को था शक, अदालत में रखी थी प्राइवेट लैब की रिपोर्ट

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुणे के रहने वाले एक शख्स ने अपनी पत्नी के चरित्र पर सवाल उठाते हुए तलाक की अर्जी दाखिल की थी। शख्स का दावा था कि वह उस बच्चे का जैविक पिता नहीं है। अपने दावे को साबित करने के लिए पति ने हैदराबाद की एक निजी लैब की डीएनए रिपोर्ट भी कोर्ट में पेश की थी, जिसमें उसके पिता होने की संभावना 'जीरो' बताई गई थी।

Ad

पति का कहना था कि उसके द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों की सत्यता साबित करने के लिए डीएनए टेस्ट ही एकमात्र पुख्ता और शुरुआती सबूत है।

'लॉयल हो तो टेस्ट से क्या दिक्कत?'

सुनवाई के दौरान महिला पक्ष की दलील थी कि किसी भी पक्ष को जबरन डीएनए जांच के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता और इस टेस्ट के बिना ही तलाक की अर्जी पर फैसला होना चाहिए।

Ad

Ad

इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने साफ किया कि जब पति ने अपनी याचिका में पत्नी के चरित्र पर गंभीर सवाल उठाए हैं और बच्चे के अधिकार पर प्रश्नचिह्न लगाया है, तो सच सामने लाने के लिए डीएनए टेस्ट एक अहम भूमिका निभाएगा। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, "यदि आप अपनी निष्ठा (Loyalty) को लेकर आश्वस्त हैं, तो आपको इस मेडिकल टेस्ट से आपत्ति क्यों होनी चाहिए?"

बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश पर लगी मुहर

इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी अपने फैसले में माना था कि पति द्वारा पेश की गई शुरुआती रिपोर्ट्स और मामले के तथ्यों को देखते हुए डीएनए जांच का आदेश देना उचित है। ऐसे मामलों में बिना वैज्ञानिक सबूत के दूध का दूध और पानी का पानी होना मुमकिन नहीं होता। अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखने के बाद इस मामले में डीएनए टेस्ट का रास्ता साफ हो गया है।