लिव-इन पार्टनर कर सकती है दहेज उत्पीड़न का केस? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब
पहले से विवाहित पुरुष के साथ लिव-इन में रह रही महिला को क्या IPC 498A के तहत “पत्नी” माना जा सकता है — सुप्रीम कोर्ट में बड़ा संवैधानिक सवाल
नई दिल्ली। क्या कोई महिला, जो पहले से विवाहित पुरुष के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही हो, भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत दहेज उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज करा सकती है? इसी अहम सवाल पर अब Supreme Court of India ने गंभीर कानूनी विचार शुरू कर दिया है और केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है।


यह मामला उस स्थिति से जुड़ा है, जहां एक पुरुष की पहली पत्नी जीवित है, लेकिन वह दूसरी महिला के साथ लिव-इन में रह रहा है। कानूनन हिंदू विवाह अधिनियम के तहत एक व्यक्ति एक समय में दो पत्नियां नहीं रख सकता। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या लिव-इन पार्टनर को “पत्नी” का दर्जा देकर IPC 498A का संरक्षण दिया जा सकता है।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति Sanjay Karol और न्यायमूर्ति N. K. Singh की पीठ कर रही है। याचिका डॉक्टर लोकेश बी.एच. द्वारा दाखिल की गई है।
याचिका के मुताबिक, लोकेश ने वर्ष 2000 में नवीना से विवाह किया था। बाद में 2010 में तीर्थ नामक महिला के साथ कथित विवाह हुआ, जिसे याचिकाकर्ता ने अवैध बताया है। तीर्थ ने 2016 में लोकेश पर दहेज की मांग को लेकर जलाने के प्रयास का आरोप लगाया और बाद में घरेलू हिंसा का केस भी दर्ज कराया।

लोकेश का कहना है कि तीर्थ के साथ उनका कोई वैधानिक वैवाहिक संबंध नहीं है। इस संबंध में उन्होंने बेंगलुरु की फैमिली कोर्ट में घोषणा वाद भी दायर किया है, जो अभी लंबित है। साथ ही उनके नियोक्ता ने प्रमाणित किया है कि कथित घटना वाले दिन वह अस्पताल में ड्यूटी पर थे।
इससे पहले Karnataka High Court ने लोकेश की याचिका खारिज कर दी थी, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी।
अब सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मुद्दे पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल Aishwarya Bhati को अदालत की सहायता के लिए कहा है। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता Nina Nariman को ‘एमिकस क्यूरी’ (अदालत का मित्र) नियुक्त किया गया है, ताकि वह निष्पक्ष कानूनी राय पेश कर सकें।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील Sanjay Nuli ने दलील दी कि IPC की धारा 498A की भाषा स्पष्ट रूप से “पति” और “पत्नी” तक सीमित है। इसे लिव-इन रिलेशनशिप पर लागू नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब पुरुष पहले से विवाहित हो।
अदालत ने माना कि यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी सामाजिक और कानूनी प्रभाव हो सकते हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट लिव-इन पार्टनर को 498A के तहत पत्नी मानता है, तो यह भारत के वैवाहिक और आपराधिक कानूनों की पारंपरिक व्याख्या में बड़ा बदलाव माना जाएगा।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार के जवाब और एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है। आने वाले दिनों में यह फैसला देशभर में लिव-इन रिश्तों और दहेज कानूनों की दिशा तय कर सकता है।
